मुश्ताक अहमद
गोंडा।नबी-ए-करीम के नवासे हजरत इमाम-ए-हुसैन ने कर्बला के मैदान में हक और बातिल की जंग में आताताई क्रूर शासक यजीद से मुहर्रम की नौंवी रात को इबादत के लिए मांगा था। इस रात्रि को इमाम-ए-हुसैन ने अपने परिवार व जांनिसार साथियों से कहा मैं नहीं चाहता कि तुम सब का परिवार बर्बाद हो। इसलिए मैं उजाला(रौशनी) बुझा रहा हूं। जो लोग अपने घर जाना चाहें चले जाएं। उजाला बुझने के बाद जब दुबारा उजाला जलाया गया तो इमाम हुसैन ने देखा कि सारे के सारे लोग बैठे खुदा की इबादत में मशगूल हैं। यह रात्रि अल्लाह के हुक्म से बहुत ही एहतराम और इबादत वाली रात्रि है। और अल्लाह की रहमतें आती रहती हैं। इस माह की दस तारीख को आशूरा कहा जाता है। यह बहुत पाक दिन होता है। इस दिन रोजा रखा जाता है। और नफिल नमाज पढ़ी जाती है,गरीबों में खाना बांटा जाता है।
नबी-ए-करीम ने इस माह की दस तारीख को हर साल रोजा रखा है। जब वो हिजरत करके मदीने में आए और उन्होंने देखा कि यहूदी लोग भी इस दिन रोजा रखते हैं। जो उनसे मालूम हुआ कि इस दिन अल्लाह ने फिरौन के जुल्म से हजरत मूसा (अ०स०) और उनकी कौम को निजात दी थी। इस खुशी से लबरेज यहूदी लोग मुहर्रम की दसवीं तारीख को ईद मनाते थे। और अल्लाह के शुक्राने में रोजा रखते थे। नबी-ए-करीम ने फरमाया कि आइंदा साल से हम दसवीं तारीख के रोजे से एक और रोजा मिला लेंगे।
इस रोज एक ऐसी घटना हुई थी,जिसका पाक ग्रंथ कुरान और हदीस के अलावा भी विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। इसी वजह से इस दिन को इमाम-ए-हुसैन की शहादत से याद किया जाता है। इनके साथ इनके कुनबे के और उनके अनुयाई बहत्तर लोग कर्बला के मैदान में यजीद के फौजों के हाथों 61 हिजरी (680 ई०) में चार दिन के भूखे-प्यासे शहीद हो गए थे। नौंवी की शाम को गांव-गांव व शहर-शहर के इमामबाड़ों व चबूतरों पर ताजिया रखकर इमाम हुसैन को याद किया जाता है। और बयाने शहादत की महफिलें आयोजित की जाती हैं। और दूसरे दिन दसवीं तारीख को आशूरा के दिन ताजिया बा अदब कर्बला में दफनाया जाता है। ज्यादातर लोग इस दिन को गम से जोड़कर देखते हैं। और इसकी इबादत में नफिल के बारे में कम ही लोगों को जानकारी है। इस रोज शिया और सुन्नी दोनों महफिलें आयोजित करते हैं। और इमाम-ए-हुसैन और उनके बहत्तर शहीदों से अपनी सच्ची मुहब्बत का इजहार करते हैं। इमाम-ए-हुसैन यजीद की फौज से लड़ाई करने नहीं गए थे,बल्कि उससे बातचीत करना चाहते थे। लेकिन आशूरा के रोज यजीदी फौजों ने उन्हें मुकाबले के लिए ललकारा और उन्हें व उनके जांनिसार बहत्तर साथियों को शहीद कर दिया। इस रोज हम दुआएं करें तो हमें बलाओं और आफतों से निजात मिलती है।

