संपादकीय…….
जंग न सिर्फ जिंदा रहकर की जाती है और न ही बेकसूर लोगों का खून बहाकर।जंग जीती जाती है अपनी नेकनीयती उसूलों और सिद्धांतों पर चलकर,जहां दुनिया को एक नई राह दिखाने के लिए अपने आपको सच्चाई के ऊपर बलिदान कर दिया जाता है। मुहर्रम का दिन एक ऐसा ही खास दिन है,जो हमें एक बार फिर याद दिलाता है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की ही जीत होती है।
इस्लामी कैलेंडर के अनुसार सन् 95 हिजरी (सन् 680 ई०) को ईराक के कर्बला नामक स्थान पर हजरत मुहम्मद साहब (स०अ०) के नाती हजरत इमाम-ए-हुसैन और उस समय के शासक यजीद के बीच जंग लड़ी गई। यह जंग सत्ता के लिए नहीं बल्कि उन इस्लामी उसूलों के लिए थी, जो मानवता, इंसानियत और इंसान की भलाई का संदेश देते हैं।
इमाम हुसैन अपने नाना के मजहब के मर्म और सही संदेश को लोगों तक पहुंचाने का काम कर रहे थे, लेकिन यजीद जैसे पथभ्रष्ट शासक को यह गवारा नहीं था। समस्या यह थी कि इस्लामी राज्य का शासक होने के कारण लोग उसके कार्यो और नीतियों को ही इस्लाम मानकर गुमराह हो रहे थे। लेकिन इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों के उच्च चरित्र थे। इस कारण लोग यह बात समझ रहे थे कि वास्तविक इस्लाम क्या है। यजीद इमाम हुसैन व उनके परिवार को मिलने वाले इस सम्मान और ख्याति से परेशान था। उसने चाहा कि इमाम हुसैन उसके हाथ पर बैअत कर लें, अर्थात उसे इस्लाम धर्म का ‘खलीफा’ स्वीकार कर लें। इसके बदले में वह इमाम हुसैन को राजसी मान सम्मान और सुविधाएं देने के लिए तैयार था, लेकिन इमाम हुसैन ने मानवता के उच्च आदर्शों को महत्व दिया और यजीद के सामने ‘बैअत’ से इन्कार कर दिया।
इस प्रकार के बाद यजीद के प्रतिनिधियों की तरफ से इमाम हुसैन को परेशान किया जाने लगा और आपके व यजीद के समर्थकों में टकराव के हालात पैदा हुए तो इमाम हुसैन ने मदीना छोड़ दिया और मक्का पहुंचे। हज का समय करीब था और इमाम हुसैन हर साल की तरह हज करना चाहते थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि यजीदी फौज या उनके आदमियों द्वारा उन्हें कत्ल करने की साज़िश की जा रही है, तो मक्का यानि नाना की जमीन को खून-खराबे से बचाने के लिए उन्होंने मक्का भी छोड़ दिया, और अपने परिवार की महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों व अन्य समर्थकों के साथ कर्बला की तरफ रवाना हुए। इमाम हुसैन के इस काफिले में कुल 72 व्यक्ति शामिल थे। कुछ इतिहासकारों ने इसकी अधिकतम संख्या 122 तक बताई है। दोनों ही स्थितियों में यह बात स्पष्ट है कि इमाम हुसैन का इरादा जंग का नहीं था, क्योंकि उपर्युक्त संख्या जिसमें 6 माह का इमाम हुसैन का बेटा अली असगर और आपकी बहन, बेटियां, पत्नी व अन्य महिलाएं भी शामिल थीं। जिससे जंग का कोई औचित्य नहीं था।
यजीद को जब इमाम हुसैन के सफर की सूचना मिली तो उसने अपनी फौज की एक बड़ी टुकड़ी हुर के नेतृत्व में रवाना की, जिसने इमाम हुसैन का रास्ता रोक लिया और आपको कर्बला के मैदान में ठहरना पड़ा। इससे पूर्व हुर की फौज का सामना होने और स्थितियों की जानकारी होने पर भी इमाम हुसैन ने हुर की टुकड़ी के पास पानी खत्म हो जाने पर उसे पानी पिलाकर अपनी विनम्रता और अतिथि सत्कार का परिचय दिया। कर्बला पहुंचने पर यजीद के फौजों की संख्या बढ़ती गई और इमाम हुसैन के खेमों (तंबुओं) को जो फरात नहर के किनारे लगे हुए थे, उन्हें वहां से हटने के लिए मजबूर किया गया। इमाम हुसैन इस स्थिति में भी सब्र करते रहे और जंग को टालते रहे। मुहर्रम की सात तारीख को आप और आपके पूरे कुनबे का पानी बंद कर दिया गया। और कर्बला की भयानक गर्मी में आपका कुनबा प्यासा रहा।
मुहर्रम की नौ तारीख की रात में अपने मुठ्ठी पर समर्थकों और परिवार के व्यक्तियों को वस्तुस्थिति से आगाह करते हुए कहा कि जो मुझे छोड़कर जो जाना चाहते है जा सकते हैं। ये लोग हमारे खून के प्यासें है, सबने आपका साथ छोड़ने से इंकार कर दिया
10 तारीख मुहर्रम की सुबह हुई तो एक और अनोखी घटना हुई कि यजीद की फौज में एक बड़े सेनापति के पद पर आसीन हुर जिसने इमाम हुसैन का रास्ता रोका था,यजीद का साथ छोड़कर इमाम हुसैन की सेवा में आ गया और उनसे अपनी गलतियों और गुनाहों के लिए क्षमा मांगी। विश्व इतिहास में शायद ही ऐसी दूसरी घटना मिले कि जिसमें लाखों की फौज का एक बड़ा सेनापति स्पष्ट रूप से हारने वाले 72 व्यक्तियों की फौज में आ मिले।वास्तव में यजीद की बड़ी फौज के मुकाबले में इमाम हुसैन की सच्चाई और आदर्शों की यह पहली जीत थी।
मुहर्रम की दस तारीख,सुबह एक ऐसी जंग शुरू हुई,जिसमें दोनों पक्षों का कोई मुकाबला ही नहीं था। इमाम हुसैन ने यजीद की फौज के सामने स्थित स्पष्ट की। उसे बताया कि वह उन मुहम्मद के नवासे हैं, जिन्हें यजीद और फौज अपना पैगम्बर और नबी मानते हैं, और जिनके बताए हुए इस्लामी आदर्शों पर चलने का झूंठा दावा करते हैं। इमाम हुसैन ने मुहम्मद साहब के द्वारा उनके (इमाम हुसैन) बारे में कही गई बातों और इस्लाम के सच्चे उसूलों और आदर्शों को यजीदी फौजों के सामने रखा लेकिन फौज पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और आपसे बैअत का सवाल दोहराया गया। जाहिर है बैअत का मतलब यजीद के कुकृत्यों और भ्रष्ट आचरण को इस्लामी आदर्शों के अंतर्गत मान्यता देना था, जो इमाम हुसैन को गवारा न था। वास्तव में यह यजीद के आतंकवाद के विरुद्ध इमाम हुसैन के द्वारा अहिंसा के हथियार से लड़ी गई जंग थी।
बहरहाल 10 तारीख को मुहर्रम की इस जंग में इमाम हुसैन ने अपने मित्र,भाई,भतीजे,भांजे,बेटे जिसमें 6 माह का बेटा अली असगर भी था,सबको कुर्बान कर दिया और स्वयं भी शहीद हो गए,लेकिन उन उच्च आदर्शों से कोई समझौता नहीं किया जो हजरत मुहम्मद साहब ने दुनिया के सामने पेश किया था। यही वजह है कि यजीद इस जंग में जीत कर भी हार गया, इसलिए कि जिस संदेश को इमाम हुसैन दुनिया तक पहुंचाना चाहते थे, वह अंततः पहुंच गया और स्वयं यजीद के पुत्र ने इमाम हुसैन की सच्चाई और उनके अहिंसा के आदर्शों को पूरा सम्मान देते हुए अपने पिता यजीद द्वारा छोड़े गए साम्राज्य को अपनाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि जिस सत्ता के पाये नबी के नवासे के खून में डूबे हों उसे वह सत्ता नहीं चाहिए। आज भी दुनिया के अनेक देशों और भारत के अनेक भागों में इमाम हुसैन की याद को मुहर्रम के मौके पर श्रृद्धापूर्बक मनाया जाता है।

