गोंडा के पीओपी के कारीगरों द्वारा घरों को सजाया और संवारा जा रहा है राजस्थानी कला के रंग से
इमरान अहमद
गोंडा। गोंडा जिले के अचलपुर निवासी जमील अहमद के हाथों की कलाकारी इन दिनों गोंडा, झांसी, बलरामपुर में अपनी चित्र कला का जादू बिखेर रहे हैं। घरों के छत हों या दीवारें या फिर रसोई घर इनकी कलाकारी से चहक और चमक रही हैं। मार्बल जैसी आकृतियां हों या फिर फूल-पत्ती अथवा अन्य डिजाइनें, सस्ती और टिकाऊ पेंटिंग की यह कारीगरी हर किसी को लुभा रही है। ये कारीगर गोंडा में ही नहीं बल्कि मुल्क के कई देशों में यहां के लोग नए मकानों की रंगाई-पुताई कराने के बजाय राजस्थानी कला को तरजीह दे रहे हैं। कारण कम खर्च में यह काम आसान हो गया है। जिसकी उम्र भी आम पेंट से कहीं ज्यादा बताई जा रही है। शहर के
महाराजगंज मुहल्ले में सलीम ने अभी हाल ही में नया मकान बनवाया है। प्लास्टर के बाद ही राजस्थान की चित्रकारी से इनके घर की दीवारें और छत कुछ खास ही दिख रही है। वह बताते हैं कि इस कला से खर्च भी कम आ रहा है। नई चीज होने के कारण कुछ अलग ही है। तकिया निवासी रऊफ, सादुल्लाहनगर के जमील और बहराइच के सिद्दीक हसन को यह कलाकारी इतनी भायी की इन लोगों ने समूचे मकान के कमरों में अलग-अलग डिजाइन तैयार कराई है,जिसे देखकर लोग इस कला की तराने गा रहे हैं।
इन सामग्रियों का करते हैं प्रयोग-मार्बल पाउडर,चूना,पेंट,सोहोक पाउडर पालिस का इस्तेमाल कर घरों में दुल्हन की तरह सजा देते हैं।
सस्ती के साथ टिकाऊ भी
वैसे तो एक बार मकानों की पेंटिंग कराने पर लगभग पांच साल तक उसकी चमक रहती है। पानी पड़ने पर इसकी चमक धुंधली होने लगती है। लेकिन इस कला की चित्रकारी से रंगाई-पुताई के मामले में सस्ती और ज्यादा टिकाऊ बताई जा रही है। इसकी खर्च सामग्री सहित 20 रुपए स्क्वायर फीट आता है, जिसकी उम्र 18 से 20 साल है। पानी व धुलाई का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

‘हमें यह कला अपने पूर्वजों से मिली है। इसके लिए हमें कहीं बाहर जाकर चित्रकारी करने की जरूरत नहीं पड़ी। बड़ों के साथ ही कुछ दिन रहकर हम इस कला को सीख कर रोजी-रोटी के लिए राजस्थान, यूपी, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में टोली लेकर निकल पड़ते हैं। काम अच्छा और सस्ता होने के कारण डिमांड भी खूब बढ़ी है।’
जमील अहमद- चित्रकार अचलपुर गोंडा।

