प्रधान,अफसर और कर्मी समेत 50 से अधिक गए जेल
मुश्ताक अहमद
गोंडा।राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) गोंडा जनपद में 15 भी 2007 को लागू हुई थी। 100 रुपए प्रतिदिन मजदूरी व सौ दिन के रोजगार की गारंटी ने रोजगार तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे श्रमिकों को उम्मीद की नई किरण दिखाई थी। 2 अक्टूबर 2009 को नरेगा को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) घोषित किया गया था। समय के साथ यह योजना भ्रष्टाचार की जाल फंसती चली गई। 18 वर्ष के सफर में इस योजना ने परियोजना निदेशक समेत 50 से अधिक अधिकारियों, कर्मचारियों व प्रधानों को जेल की हवा खिलाई। गोंडा जनपद में 30 करोड़ रुपए से अधिक की वित्तीय अनियमितता पकड़ी जा चुकी है।
खिलौना खरीदने में घोटाला
नरेगा योजना में खिलौना खरीद के नाम पर वित्तीय वर्ष 2008-09 में पहला बड़ा घोटाला प्रकाश में आया था। जिला स्तर से ही तत्कालीन परियोजना निदेशक डीआरडीए जीपी गौतम ने कार्यस्थल पर मनरेगा मजदूरों के बच्चों के खेलने के लिए 5 करोड़ 78 लाख 25 हजार 170 रुपए मूल्य के खिलौनों के खरीद में नियमों की अनदेखी करके की थी। घोटाले का राजफाश तत्कालीन संयुक्त विकास आयुक्त बलिराम ने किया था। जांच में पीढ़ी व तीन अन्य कर्मचारियों को दोषी मानते हुए कार्रवाई की गई थी लेकिन कुछ बच गए थे। मामले की दोबारा जांच संयुक्त विकास आयुक्त मनीष रंजन से कराई गई। वर्ष 2018 में संबंधित लिपिक को निलंबित कर दिया गया। जांच सीबीआई भी कर चुकी है। घोटाले में परियोजना निदेशक को जेल की हवा खानी पड़ी थी। मृतकों के नाम से फर्जी हाजिरी,बिना कार्य कराए भुगतान के मामलों में कार्रवाई हुई।
‘पिछले कुछ वर्षों में मनरेगा ने ग्राम पंचायतों को कंगाल कर दिया। कार्य कराने के एक वर्ष बाद भी सामग्री मद में भुगतान नहीं हो रहा है। केन्द्र सरकार यदि कोई नई योजना ला रही है, जिससे गांवों में रोजगार ज्यादा मिलने के साथ ही विकास कार्य तेज होंगें तो उसका स्वागत है’।
दुर्गेश प्रताप सिंह,ग्राम प्रधान ढोढ़िया पारा

