मुश्ताक अहमद
गोंडा।जिले के डुमरियाडीह पुलिस चौकी से महज तीन किमी दक्षिण डुमरियाडीह-तरबगंज मार्ग पर ग्राम पंचायत बाल्हाराई में स्थित पौराणिक शिव मंदिर है। जो बलेश्वरनाथ नाम से ख्यतिलब्ध है। मंदिर पर टेक्सी, टेम्पो व निजी वाहनों से जाया जा सकता है। यहां शिवरात्रि या सावन अधिमास व अन्य शिवपर्वों पर मेला लगता है। जिसमें जिले के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं, वैसे यहां धार्मिक गतिविधियां हमेशा होती रहती हैं।
जानते हैं मंदिर का इतिहास
बाबा बालेश्वरनाथ के इस मंदिर के इतिहास के बारे में श्रीमद्भागवत में उल्लेख मिलता है। अयोध्या नरेश मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के पूर्वज राजा सुद्युम्न शिव पार्वती के वर्जित क्षेत्र में जाने से शापित होने के कारण वो स्त्री हो गए थ। शाप समन हेतु वो अपने गुरु वशिष्ठ के पास गये। उन्होंने राजा सुद्युम्न को सरयू के उत्तर-पश्चिम गोनार्द जनपद में जाकर शिवलिंग स्थापित कर तपस्या करने को कहा। संस्कृति में स्त्री को बाला तथा राजा को राई कहा जाता है। इसलिए बाला राजा द्वारा स्थापित शिव लिंग बालेश्वर कहलाया। प्रमाण स्वरूप जिस स्थान पर राजा सुद्युम्न ने तप किया वो मंदिर के समीप उस गांव का नाम बाल्हाराई आज भी है। वहीं एक अन्य किवंदंती के अनुसार यह क्षेत्र बेल का जंगल था। मुगल शासक की सेना यहां रुकी तो भोजन निर्माण के लिए सूखे बेल के पेड़ को काटने पर शिव लिंग निकला। जिसे साथ रहे सैनिकों ने आरे से काटने का प्रयास किया जिससे खून की धार के साथ मधुमक्खी, सांप, बर्रे आदि ने हमला कर दिया सैनिक भाग गए फिर इलाकाई लोगों के आपसी सहयोग से मंदिर निर्माण हुआ। बेल से निकले शिवलिंग के कारण इसका नाम विल्वेश्वर नाथ रखा जो कालांतर में बालेश्वर नाथ पड़ा।
मेले की तैयारियां मुकम्मल
शिवरात्रि में श्रद्धालुओं को दिक्कत न हो इसके लिए मंदिर परिसर की साफसफाई की गई,नलों को दुरुस्त किया गया।यद्यपि मंदिर परिसर की भूमि विवादित होने के कारण बरसात होने पर जलभराव से दिक्कत रहती है।
पुजारी दिलेचंद बाबा ने बताया की इस मंदिर का पौराणिक इतिहास है इसके निर्माण के बारे में श्रीमद्भागवत में वर्णित है। यहां पूरे वर्ष भागवत,भंडारे व अखंड,रामायण समेत अनेक धार्मिक आयोजन होता रहता है। पुत्र प्राप्ति पर पुतली लिखाई भी होती है।
बाल्हाराई गांव के सुरेन्द्र मिश्रा ने बताया कि इस मंदिर के प्रति लोगों में गहरी आस्था है। यहां मन्नते भी पूरी होती है। महाशिवरात्रि या सावन में गरीब अमीर व सभी जातियों के लोग बिना भेदभाव के एक साथ नतमस्तक होते है। पूरे साल यहां पूजन अर्चन होता रहता है।

