इमरान अहमद
मनकापुर।इस्लाम के आखरी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सoतoअo के नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की सहादत की याद में मानाया जाने वाला त्योहार मुहर्रम परंपरागत व बेहद गमगीन माहौल में मनाया गया।इस दौरान मुस्लिम समुदाय ने या हुसैन,हक हुसैन,शहीदे करबला हुसैन जैसे गमगीन सदाओं के बीच ताजियों का जुलूस निकाला।
आपको बता दें की हर साल मुहर्रम के दिन हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत की याद में मोहर्रम का त्योहार मनाया जाता है।मोहर्रम की 10 वीं तारीख़ जिसे अरबी ज़बान में यौमे आशुरा कहा जाता है।मोहर्रम का चांद देखने के बाद इस्लाम के मानने वाले इस 10 दिन को मोहम्मद साहब के नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 अहलो अयाल (रिश्तेदारो) की शहादत को याद करते हैं।इसी कड़ी में यौमे आशुरा के दिन लोग ग़मगीन माहौल में नौहा पढ़ते हुए सीना जनी करते हुए जुलूस भी निकालते हैं साथ ही जगह-जगह मजलिसों का आयोजन भी किया जाता है।
रविवार को मनकापुर क्षेत्र के अलग-अलग क्षेत्रों में मुहर्रम का जुलूस शांतिपूर्वक निकला।जिसके बाद ताजियो को ईदगाह के पास स्थित करबला में ले जाकर सुपुर्द-ए-खाक किया गया।मनकापुर बाजार सहित कई गांवों का जुलूस परंपरागत तरीके से निकल कर ईदगाह स्थित कर्बला तक ले जाया गया जिसमे मनकापुर चौक,पीलखाना,रामापुर,धर्मपुर,गनौरीजोत,अशरफपुर गाँव का जुलूस शामिल रहा।इस दौरान लोगों ने जगह जगह पंडाल लगाकर शर्बत,पानी,फल,दूध,बिरयानी का भी वितरण किया।
क्यूँ मनाया जाता है मुहर्रम?
जब इस्लाम में खिलाफत यानी खलीफा का राज था।ये खलीफा पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता होता था।पैगंबर साहब की वफात के बाद चार खलीफा चुने गए थे।लगभग 50 साल बाद दुनिया में घोर अत्याचार का दौर आया,मक्का से दूर सीरिया के गर्वनर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया,उसके काम करने का तरीका इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ था,तब इमाम हुसैन ने यजीद को खलीफा मानने से इनकार कर दिया।इससे नाराज यजीद ने अपने राज्यपाल वलीद पुत्र अतुवा को फरमान लिखा ‘तुम हुसैन को बुलाकर मेरे आदेश का पालन करने को कहो,अगर वो नहीं मानें तो सिर काटकर मेरे पास ले आओ।इमाम हुसैन 18 रज्जब 60 हिजरी यानि 10 जनवरी 680 ई० 56 वर्ष की उम्र में अपना वतन मदीना छोड़कर सपरिवार कर्बला की ओर चल दिए।मंजिलें तय करते हुए वह हज के इरादे से 60 हिजरी को मक्का पहुंचे।इमाम हुसैन के पहुंचने से पहले ही वहां पर यजीद के सैनिक इमाम हुसैन को कत्ल करने के इरादे से हाजियों के भेष में ‘काबाशरीफ’ में पहुंच चुके थे।इसकी जानकारी इमाम हुसैन को हुई।मौला हुसैन नहीं चाहते थे कि ‘काबा’ की पाक जमीन खून से रंग जाए।जिससे वो मदीना ना जाकर कर्बला चले गये।वहां जालिम शासक यजीद और उनके साथियों ने इमाम हुसैन को कर्बला के मैदान में चारों ओर से घेराबंदी कर दिया और उन पर व उनके परिवार के साथ जुल्म-ज्यादती और बर्बरता करने लगा।मुहर्रम की सातवीं तारीख थी जब इमाम हुसैन और उनके साथियों का पानी बंद कर दिया।इस दौरान यजीदियों ने उनके 6 माह के मासूम बच्चे को शहीद कर दिया।फ़िर भी वे लोग तीन दिन भूखा-प्यासा रहकर जंग लड़ते रहे।तारीख के हवाले से एक तरफ़ यजीदियों की लाखों में तादात थी तो दूसरी तरफ़ इमाम हुसैन मात्र 72 लोग थे,यजीदी फौज ने इमाम को चारों ओर से घेरकर उन पर एक बारगी हमला कर दिया।इमाम हुसैन बुरी तरह जख्मी होकर घोड़े से जमीन पर आए और शिम्र नाम के जालिम यजीदी सख्श ने आपको शहीद कर दिया।इमाम हुसैन और उनके परिवार व साथियों की लाशें मैदान-ए-कर्बला की तपती जमीन पर कई दिनों तक बे कफन रहीं।इमाम हुसैन और उनके 72 जानिंसार साथियो ने कर्बला के मैदान में अपनी कुर्बानी देकर मानवता और इंसानियत को जिंदा-ए-जावेद कर दिया।
रविवार को इन्हीं कर्बला के बहत्तर शहीदों के शहीदी का दिन था।इस दिन कर्बला के उन सभी शहीदों को याद किया जाता है,जिन्होंने खुद को शहीद कर यजीद की बातिल ताकत को सदा के लिए खत्म कर दिया।

