✍️लेखक : संपादक मुश्ताक अहमद
गोंडा।हजरत इमाम-ए-हुसैन की मां जनाब-ए-फात्मा की वफात (मृत्यु) के बाद हजरत मौला अली शेर-ए-खुदा ने अरब के एक काबिले की परहेजगार खातून से निकाह की। उनसे चार बेटे हुए। इन चार बेटों में हजरत अब्बास सबसे बड़े थे। हजरत अब्बास की खूबसूरती की वजह से उन्हें मुल्क-ए-अरब का मशहूर कबीला ‘वनी हाशिम’ का ‘चांद’ कहा जाने लगा। हजरत अब्बास को बचपन से ही हजरत इमाम-ए-हुसैन से बहुत मुहब्बत थी। वह हमेशा इमाम-ए-हुसैन के साथ रहते थे। इमाम के पसीने पर अपना ‘खून’ बहाने को तैयार रहते थे। बहादुरी में भी हजरत अब्बास बेमिसाल थे।
मुहर्रम की सात तारीख से ही इमाम-ए-हुसैन और उनके मासूम बच्चों के साथ पूरे खेमे का पानी बंद कर दिया गया। कर्बला की तपती रेगिस्तान और पानी का न होना हजरत अब्बास को हद से ज्यादा बेचैन किए था। इमाम-ए-हुसैन के दोस्त एक-एक कर मैदान-ए-जंग में जाने लगे और शहीद होने लगे। फिर घर वालों की बारी आई और एक वक्त ऐसा आया कि इमाम-ए-हुसैन के साथ हजरत अली अकबर और हजरत अब्बास के अलावा कोई जिंदा नहीं बचा। वह इंसानियत को बचाने के लिए बार-बार जंग की इजाजत मांग रहे थे। कहते थे कि मौला बच्चों की हाय प्यास-हाय प्यास की आवाज मुझे मारे डालती है। आखिर इमाम-ए-हुसैन ने कहा कि अब्बास आओ सकीना से मश्क लेकर प्यासे बच्चों के लिए पानी ले आओ। हजरत अब्बास खेमे में गये और अपनी भतीजी से कहा कि बेटी मुझे एक मश्क ला दो,अभी मैं तुम लोगों के लिए पानी लाता हूं। प्यासे बच्चों को एक उम्मीद बंध गई। हजरत अब्बास, जनाब-ए-जैनब और खेमे के लोगों से मिलकर इमाम-ए-हुसैन के पास आए। उन्होंने कहा अब्बास तुम मेरे लश्कर के अलमदार हो,मैं तुम्हें कैसे जाने दूं।हजरत अब्बास ने बड़ी मिन्नतें मौला हुसैन से करके अलम और मश्क लेकर मैदान में आए। ऐसी जंग की दरिया-ए-फुरात पर कब्जा कर लिया। मश्क पानी से भरा, लेकिन खुद पानी को हाथ तक नहीं लगाया,अपने घोड़े को इशारा किया कि तू पानी पी ले,लेकिन इब बेजुबान जानवर ने अपना मुंह पानी से हटा लिया।
अब मश्क भर कर हजरत अब्बास वापस खेमे की ओर चले यह देखकर भागी हुई फौज वापस आ गई और चारों ओर से एक साथ हमला कर दिया। भूखा-प्यासा कब तक हजारों से लड़ता। हजरत अब्बास की कोशिश थी कि किसी तरह पानी खेमे तक पहुंच जाए। लेकिन एक ऐसा तीर आया जो मश्क पर लगा और पानी बह गया। पानी बहने के साथ ही हजरत अब्बास और बच्चों की उम्मीद टूट गई। वह जख्मी होकर जमीन पर गिर गये और इमाम-ए-हुसैन को आवाज दी। इमाम-ए-हुसैन बेटे अली अकबर के साथ मैदान में पहुंचे। हजरत अब्बास ने आंखें खोलकर देखा और कहा ‘आका’ मैं अपना वादा पूरा न कर सका,बच्चों को पानी न पिला सका। मेरी लाश खेमे में न ले जाइएगा। यह जुमला कहते-कहते हजरत अब्बास इस दुनिया से कूच कर गये।
गोंडा में वर्षो से हिंदू परिवार के लोग ताजिया रख लें जाते हैं कर्बला,महिलाएं व पुरुष करते हैं अजादारी
यहां सैकड़ों वर्षों से साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल कायम है। ऊपर वाले ने जब जमीं पर इंसान को बनाकर भेजा तो उसने नहीं सोचा था कि धरती पर जाकर यह इंसान मजहब की दीवार खड़ी कर देगा। धरती पर आकर इंसान हिंदू और मुसलमान बन गया। उसने मंदिर और मस्जिद बना ली। मंदिरों से घंटा, घड़ियालों की ध्वनि सुनाई देने लगी तो मस्जिदों से अंजान की।
आज हर जगह धर्म के नाम एक दूसरे से नफ़रत की जा रही है, लेकिन इन सबसे इतर आज भी तमाम लोग ऐसे हैं जो ये मानते हैं कि जिस दिन मस्जिदों से घंटे और मंदिरों से अंजान की आवाज आयेगी, उस दिन धरती पर इंसानियत का राज कायम हो जायेगा। ऐसा ही एक गांव है वजीरगंज में अचलपुर। यहां हिंदू बिरादरी के चौहान लोग रहते हैं, जो सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम करते हुए वर्षों से गांव में बने चबूतरे पर ताजिया रखते हैं और रौजा के कर्बला में मुहर्रम की दसवीं तारीख को उनके खोदे गए गड्ढे यानि कब्र में ताजिया दफनाते है। महिलाएं व पुरुष मर्सिया पढ़ते हुए पायक बन अजादारी करते हैं। रोज जैसे हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, वैसे ही मुहर्रम की नौवीं तारीख को ताजिया रख नज्र कराते और मजलिस भी सुनते हैं और या हुसैन की सदाएं लगाते हैं। गांव वाले बताते हैं कि मौला हुसैन की विशेष कृपा है। यहां दोनों समुदाय के आपसी सौहार्द व एकता की अनूठी मिसाल है। परिवार का कहना है कि उन्हें खुशी है कि वे ताजिया बना कर रखते हैं,पायक बन अजादारी करते हैं। ग्राम प्रधान अचलपुर मोहम्मद जकी ने बताया कि यह परंपरा वर्षों से यह परंपरा चल रही है। ऐसा शायद ही किसी अन्य जिले या राज्य में होता होगा।

