मुश्ताक अहमद
गोंडा।इमाम-ए-हुसैन के प्रति अटूट आस्था रखने वाले काशीपुर गांव के शाह(फकीर) विरादरी के लोग बांस की फट्टियों से अपने हुनर का नमूना गढ़ इमाम-ए-हुसैन का रौजा (ताजिया) बनाते हैं। इमाम-ए-हुसैन की याद में खिराज-ए-अकीदत पेश कर उनकी शहादत को यादकर बारगाहे इमाम में नजराने अकीदत का सुबूत देते हैं। इनके हाथों से बनाया, सजाया और संवारा गया ताजिया अपने ही मुल्क में नहीं बल्कि पड़ोसी देश नेपाल में खास पहचान रखता है।

गोंडा से 22 किमी दूर मोतीगंज-तरबगंज मार्ग पर काशीपुर गांव है। इस गांव में फकीर विरादरी के लोग रहते हैं। उनके पास जमीन, जायदाद सब कुछ है। ताजिया बनाना इनके लिए कोई रोजी-रोटी का साधन नहीं है। बल्कि ये अपने रसूल के नवासे इमाम-ए-हुसैन की याद में ताजिया बनाकर गम का इजहार करते हुए मुल्क के अमन-चैन की सलामती की दुआ करते हैं। ये साल के दो माह बकरीद और मुहर्रम गांव में रहकर ताजिया बनाते हैं और त्योहार गांव में ही मनाते हैं। साल के दस माह परिवार की जीविका चलाने के लिए मुंबई, गुजरात व खाड़ी देशों में चले जाते हैं। नौशाद, असगर,निजार और यार मुहम्मद बताते हैं कि गांव के लोग पुश्त दर पुश्त ताजिया बनाने और बेचने का काम करते आ रहे हैं। यहां की ताजिया वाहनों से गोरखपुर, सुल्तानपुर, आजमगढ़, कानपुर, लखनऊ के अलावा नेपाल भी भेजा जाता है। कोलकाता, चेन्नई और अजमेर सहित कई स्थानों पर ताजिया भेजने के लिए ट्रेन की बोगियां बुक कराई जाती हैं। ताजियों को सफेद कपडों से ढक कर ब अदब ले जाया जाता हैं। यहां डेढ़ सौ रुपयों से 60 हजार रुपये तक की ताजिया मिलती है।
ऐसे बनाई जाती है ताजिया
मझला गोल मीनार और चवीगिया ताजिया बनाने के लिए शीशे के टुकड़े, माचिस की खाली डिब्बी, थर्माकोल आदि सामान और साधारण ताजिया के लिए बांस की तीलियों से ढांचा तैयार कर कागज की मड़ाई की जाती है। उसके बाद अवरक, विभिन्न रंगों के चांदी का वर्क, मोतियों, फूल और पत्तियों आदि से सजावट की जाती है। बारादरी, तिलकया समेत कई नामों से ताजिया तैयार किया जाता है।

