मुश्ताक अहमद
गोंडा।जुल्म-ज्यादती के बदले इंसानियत का पैगाम देने वालों में कर्बला के बहत्तर शहीदों में जिन दो मासूम शहीदों का जिक्र किया जाता है। वह हजरत इमाम-ए-हुसैन की सगी बहन जनाब-ए-जैनब के दोनों कमसिन बेटे औन और मुहम्मद हैं।तारीख में इन दोनों बच्चों की उम्र नौ और ग्यारह साल की बताई जाती है।
औन और मुहम्मद मां और बाप दोनों की तरफ से हाशिमी थे। इनके वालिद जनाब-ए-अब्दुल्ला थे, जो जनाब-ए- जाफर के बेटे थे और मौला अली शेर-ए-खुदा के सगे भतीजे थे। औन व मुहम्मद की मां बीवी फात्मा और हजरत मौला अली शेर-ए-खुदा की बड़ी बेटी बीवी जैनब थीं। इस अजीम सिलसिले के यह बच्चे हजरत मौला अली के नवासे और हजरत जाफर के पोते थे। इसलिए शुजाअत इनको विरासत में मिली थी। इसलिए जब मानवता और इंसानियत पर वक्त पड़ा और इमाम-ए-हुसैन घर वालों को लेकर मदीने से चले तो बीबी जैनब भी अपने दोनों बच्चों औन और मुहम्मद को साथ लेकर इमाम-ए-हुसैन के साथ चलीं। दो मुहर्रम को काफिला-ए-हुसैनी कर्बला पहुंचा। फिर सात मुहर्रम से इमाम-ए-हुसैन के काफिले पर यजीदी फौजों ने पानी तक बंद कर दिया। दस मुहर्रम रोज-ए-आशूरा आ गया।
ये मानवत और इंसानियत को बचाने के लिए कुर्बानियां पेश करने का दिन था,हर मां चाहती थी कि हक और मानवता को बचाने के लिए सबसे पहले अपने बच्चों को कुर्बान करें। जब इमाम-ए-हुसैन के दोस्त-अंसार सब शहीद हो गये। अब घर वालों की बारी थी, तो जनाब-ए-जैनब सबसे पहले बच्चों को लेकर इमाम-ए-हुसैन के पास आईं और कहने लगी कि भैया अब तो घर वालों की बारी आ गई है। मैं चाहती हूं कि सबसे पहले औन और मुहम्मद को नाना के दीन और मिटती हुई इंसानियत और मानवता को बचाने के लिए कुर्बान करा दूं। इमाम-ए-हुसैन किसी भी तरह इन मासूम बच्चों को जंग की इजाजत नहीं दे रहे थे। आखिर जब बीबी जैनब का इसरार बहुत बढ़ा तो इमाम-ए-हुसैन मजबूर हो गये और औन व मुहम्मद को मैदान-ए-जंग में जाने की इजाजत दे दी।
मौला हुसैन व उनके कुनबे की बेमिसाल है शहादत
मौलाना जाहिद अली नूरी ने बताया कि कर्बला के मैदान में इमाम-ए-हुसैन ने अपनी और परिवार व जानिसार साथियों की शहादत पेश कर रहती दुनिया तक इंसानियत के अधिकारों को महफूज कर दिया। नवास-ए-रसूल ने हक और इंसानियत की लड़ाई लड़ते हुए इंसानियत को नई ताकत अता करने के लिए सर कटाकर जीत हासिल कर यह पैगाम दिया कि असत्य और अधर्मी की हमेशा हार और हक व सत्य की जीत निश्चित है। पैगाम-ए-इंसानियत की इस जंग में इमाम को ‘खुदा’ ने ऐसी ताकत अता की, कि उन्होंने अपने 6 माह के बच्चे को भी कर्बला के मैदान में शहादत पेश की। इमाम व उनके साथी सब्र और शुक्र के साथ कर्बला के मैदान में इबादत-ए-इलाही करते रहे।
जुल्म-ज्यादती मिटाने के लिए इमाम हुसैन ने दी शहादत
मुहर्रम की दो तारीख पर मरहूम बशीर हसन रिज्वी के बौगड़ा स्थित इमामबाड़ा में मजलिस का आयोजन किया गया। मजलिस शोज पढ़कर जुल्म-ज्यादती के खिलाफ इंसानियत को बचाने के लिए कर्बला के शहीदों को याद करने के बाद शायरे अहलेवैत आरिफ रिज्वी ने सलाम पेश किया।मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना सैयद महताब हुसैन ने खिताब करते हुए कहा,कि जिसतरह इमाम-ए-हुसैन ने हक और इंसानियत की रक्षा के लिए कर्बला में अपनी कुर्बानी दी,इस्लाम अनुयाई ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लोगों को उस रास्ते पर चलना फर्ज है। इंसानियत के रास्ते पर चलने की सीख कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन ने दी।

