मुश्ताक अहमद
गोंडा।ईद-उल-फितर इस्लाम अनुयायियों का सबसे बड़ा त्योहार है, जो पैगंबर हजरत मोहम्मद (स०अ०) के हुक्म से, उन्हीं के जमाने से सन् 2 हिजरी से मनाया जाता है। जब पैगंबर साहब हिजरत करके मदीना आए थे, उस समय वहां पर साल में दो त्योहार मनाए जाते थे, तो पैगंबर साहब ने फरमाया कि अब वो त्योहार नहीं मनाए जायेंगे। उनकी जगह पर दो इस्लामी त्योहार मनाए जायेंगे। एक ईद-उल-फितर (ईद) और दूसरा ईद-उल-अजहा (बकरीद)।
रमजान के महीने के रोजो के बाद नया चांद निकलता है, उसे ‘ईद का चांद’ कहा जाता है। ये शव्वाल का महीना होता है, जिसकी पहली तारीख को ईद मनाई जाती है। फितर यानि इफ्तार वाली ईद यानी पूरे महीने रोजे रखने के बाद जिस पहली तारीख को हम खाना खा रहे हैं, उस दिन की ईद। ईद के दिन फितरा अदा किया जाता है, जो गरीबों को दिया जाता है। इसकी मेकदार है ‘आधा-सा’ खजूर या गेंहू या ‘एक सा’ जौ या उसका आंटा। कुछ लोग ‘आधा सा’ का मायने बताते हैं कि पौने दो किलो और कुछ लोगों की नजर में इसका मतलब दो किलो 45 ग्राम गेंहू या आंटा होता है।
ईद के दिन सुबह होने के बाद से फितरा देने का हुक्म है। नबी-ए-करीम ने फरमाया है कि फितरा अदा करो, जिससे तुम्हारे रोजे कुबूल होंगे और साथ ही गरीबों के खाने-पीने का भी बंदोबस्त करें। ये अदा करना वाजिब है। बाप अपनी तरफ से और अपने बच्चों की तरफ से अदा करे। अगर बाप नहीं होगा तो दादा अपने व अपने पोते-पोतियों की तरफ से अदा करे, लेकिन पत्नी की तरफ से अदा करना जरूरी नहीं है। वह खुद ही फितरा अदा करेगी। नहीं तो अपने पति से कहेगी, वह अदा करेंगे। अगर बच्चों के पास साढ़े 52 तोला चांदी या उसके बराबर की नगदी है तो वह स्वयं फितरा अदा कर सकते हैं।
जब हम रमजान के पूरे रोजे रखते हैं और रमजान की रातों में तरावीह की नमाज पढ़ते हैं, और पूरी-पूरी रात इबादतें करते हैं और रमजान की शबे-कदर यानि मुबारक रातों को जागकर गुजारते हैं, सदका खैरात करते हैं तो अल्लाह हमसे राजी होकर चांद रात को हमें अज्र (इनाम) देता है और हमसे राजी हो जाता है। इस खुशी में अगले दिन ईद मनाई जाती है। ईद के दिन सुबह सवेरे नहा-धोकर साफ-सुथरे या नये कपड़े पहनकर सब लोग ईद की नमाज के लिए ईदगाहों और मस्जिदों की ओर निकलते हैं। सभी धीमी आवाज में अल्लाह की तकबीर पढ़ते हुए जाते हैं और वहां जाकर ईद की नमाज पढ़ते हैं। इस तरह सब लोग अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं।
इस मौके पर इमाम वहां उनको दीनी बातें बताकर संबोधित करते हैं। वे बताते हैं कि असल ईद की खुशी उन लोगों के लिए है, जिन्होंने रमजान में अल्लाह का कहना माना और इबादत की। वह ये अपील करते हैं कि अल्लाह का हुक्म मानों और जैसे रमजान में आप लोगों ने खुदा को राजी किया है, उसी तरह से पूरा जीवन उसकी ताबेदारी में गुजारो। जैसे आपने फितरा दिया है, इसी तरह आप हमेशा गरीबों का ख्याल रखो। सबके साथ मिल-जुल कर प्रेम से रहो और जैसे ईदगाह में आप जमा हुए हैं, याद रखो कि वैसे ही कयामत के दिन अल्लाह के सामने पेश होना है। लिहाजा वहां की तैयारी करो। सब मिलकर वहां दुआ करते हैं, गले मिलते हैं और ईद की मुबारकबाद देते हैं, मिठाइयां बांटते हैं, ईदी बांटते हैं और सारे दोस्त-रिश्तेदार मिलकर ईद मनाते हैं।
ईद की खुशी में मुसलमानों के साथ सारे धर्म के लोग शरीक होते हैं। ईद के अवसर पर जगह-जगह ईद मुबारक के बैनर लगाते हैं। ये मुसलमानों का एक बड़ा त्योहार है, जिसे सब लोग मिल-जुल कर मनातें हैं। इससे हमें अल्लाह के इबादत की प्रेरणा मिलती है। साफ-सुथरा रहना, गरीबों की मदद करना, सबके सुख-दुख में शरीक रहना और अपने दिल को हरेक के लिए साफ रखना, यही ईद का असली पैगाम है।
‘जब हम रमजान के पूरे रोजे रखते हैं, और रमजान माह की रातों में तरावीह की नमाज पढ़ते हैं। और इस पाक माह में पूरी-पूरी इबादतें करते हैं। और इस माह की शबे-कदर यानि मुबारक रातों को जागकर गुजारते हैं, सदका खैरात करते हैं तो अल्लाह हमसे राजी होकर चांद रात को हमें अज्र (इनाम) देता है और हमसे राजी हो जाता है। इस खुशी में अगले दिन ईद मनाई जाती है’।
‘कारी मोहम्मद आरिफ’
‘ इस्लाम का प्राथमिक उद्देश्य है कि बन्दों को इस प्रकार से ढाला जाए कि वे दूसरों के दु:ख-दर्द को समझें और सदा उनकी मदद को तैयार रहें। ईद का त्योहार यही संदेश देता है’।
‘मौलाना फैजान रजा’

