भगवान राम से लेकर जैन तीर्थंकर,बुद्ध एवं सूफी संतों की मानवीय एकता
अयोध्या।हम इश्क के बंदे हैं,मजहब से नहीं वाकिफ,गर काबा हो तो क्या बुतखाना हो तो क्या! अवध सूबे के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह की जुबान इस लाइन के साथ यूं ही नहीं दर्जी। इसके पीछे संपूर्ण अवध और विशेष रूप से उस अयोध्या का संस्कार था, जहां से उनके पुरखों ने सूबे का शासन किया। रामनगरी भले ही रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की धुरी के तौर पर सुर्खियों में रही हो और भले ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया। पर हकीकत यह है कि यहां ‘आपसी सहमति’ युगों से प्रवाहमान है। भगवान राम स्वयं अपने औदार्य के लिए सुप्रसिद्ध रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान राम का चरित्र विवेचित करते हुए कहा है, ऐसो को उदार जग माहीं बिनु सेवा जो द्रवहिं दीन पर राम सरिस कोउ नाहीं।
भगवान राम से पूर्व अयोध्या के ही राजकुल में पैदा हुए ऋषभदेव को उसी जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है, जिसकी एक उपधारा स्यादवाद मानवीय सहमति-स्वीकार्यता के लिए आज भी मिसाल के रूप में याद किया जाता है। मानवता के महान उन्नायक गौतम बुद्ध भी रामनगरी के आकर्षण से अछूते नहीं रहे। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गौतम बुद्ध ने यहां 16 वर्षावास किए और उन्होंने मानवीय एकता-एकात्मता के अनेक कालजयी उपदेश इसी धरती से दिए। नगरी के पौराणिक स्थल मणिपर्वत के पृष्ठ में हजरत नूह(अ०स०) की मजार है। हिंदू भी यहां नतमस्तक होते हैं। प्राचीन इतिहास के कतिपय अध्येताओं का मानना है कि सनातन परंपरा के महाराज मनु ही इस्लामिक परंपरा में हजरत नूह के रुप में स्वीकृत हैं। बहरहाल, कालांतर में सूफी संतों ने भी रामनगरी की ओर रुख किया। इनमें सैयद इब्राहीम शाह प्रमुख हैं। स्वर्ग द्वार मुहल्ले में इनकी मजार मुस्लिमों व हिन्दुओं में समान रुप से पूजित है। मंदिरों की नगरी में यूं तो दो दर्जन से अधिक मस्जिदें भी हैं, और इनमें से आधा दर्जन हिन्दू -मुस्लिम एकता की वाहक हैं।
पहुंचे संत से अनुप्राणित है सांझी विरासत
रामनगरी की सांझी विरासत संत राममंगलदास सरीखे पहुंचे संत से भी अनुप्राणित है। उनके ग्रंथों से ज्ञात होता है कि उन्होंने रुहानी तौर पर चिरनिद्रा में लीन अनेक सूफी संतों का भी साक्षात्कार किया था। बड़ी बुआ, हजरत नूह (अ०स०) व हजरत सैयद इब्राहीम शाह की दरगाह उनकी आस्था से जुड़ी रही। आध्यात्मिक गुरु राम सिंह के अनुसार हिंदू-मुस्लिम का झगड़ा दुनियावी लोगों के बीच का द्वंद है, अयोध्या तो इस द्वंद मुक्त सय के अभिलाषी वीतरागी साधकों की नगरी रही है।
जीर्णोद्धार कराई थी मंसूर अली ने हनुमान गढ़ी
हिंदू-मुस्लिम के एकता के फलक पर हनुमान गढ़ी का जिक्र अहम है। मान्यता है कि 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अवध के पहले नवाब मंसूर अली खां हनुमान गढ़ी के संत अभयरामदास के प्रभाव में आए और उनके आशीर्वाद से उनके किसी आत्मीय परिजन को असाध्य रोग से निजात मिली। बदले में नवाब ने कृतज्ञता स्वरुप हनुमान जी का भव्य मंदिर बनवाया।

