इमरान अहमद
गोंडा।आज से 13 सौ 83 वर्ष पूर्व मुहर्रम की सात तारीख को कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन व उनके कुनबे के लोगों का जालिम यजीदियों ने पानी रोक दिया था। उनकी शहादत आज पूरी दुनिया में मनाया जाता है। कर्बला में हुई हक और जुल्म ज्यादती की जंग में इमाम के कुनबे के 72 लोग शहीद हुए थे। मौला हुसैन की पैदाइश 8 जनवरी 626 ई० को मक्का के पवित्र स्थान ‘काबा शरीफ’ में हुई थी।
आका हुसैन किसी एक मजहब व सम्प्रदाय के नहीं थे। बल्कि वे संपूर्ण मानव जाति के थे। जुल्म, ज्यादती, नाइंसाफी व असत्य के आगे सर न झुकाने वाले मौला हुसैन 61 हिजरी 680 ई० ईराक स्थिति कर्बला के मैदान में लड़ते हुए शहीद हो गए थे। इमाम के उन मासूमों की याद में सात मुहर्रम को मेंहदी (छोटी ताजिया) रखी जाती है। कर्बला के मैदान में हुई दिल दहला देने वाली इस जंग में इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ तीन दिन से भूखे-प्यासे रहे। दसवीं मुहर्रम को यजीदियों ने शहीद कर दिया था। इमाम अपने छोटे लश्कर के बल पर सबसे शक्तिशाली क्रूर शासक यजीद व उसकी एक लाख फौज के छक्के छुड़ा दिए थे। यजीद चाहता था कि कि इमाम उसे इस्लाम का खलीफा मान लें और उसके हाथ पर बैअ्त यानि (संधि) कर लें। लेकिन इमाम ने ऐसा न करने का प्रण कर लिया। 28 रज्जब सन् 61 हिजरी को इमाम अपने परिवार के साथ मदीने से चले, 5 माह सफर करने के बाद दो मुहर्रम को कर्बला के मैदान में पहुंच शिविर लगाया। इसकी सूचना यजीद को हुई। उसने पहले बैअ्त का प्रस्ताव भेजा। जिसको इमाम ने अस्वीकार कर दिया। सात मुहर्रम से ही इमाम-ए-हुसैन के कुनबे का पानी बंद कर दिया और नौ मुहर्रम की रात्रि में ही फौजों के साथ इमाम के काफिले पर हमला कर दिया। इस हमले का मोर्चा हजरत अब्बास ने संभाला।
इमाम ने जालिमों से इबादत के लिए एक रात्रि का समय मांगा। दस मुहर्रम की सुबह यजीद के फौज की कहर से इमाम के एक-एक कर सभी साथी शहीद हो गए। 6 माह का मासूम अली असगर को हुरमला ने तीन फाल का तीर मारकर शहीद कर दिया, अली अकबर बेटे व भतीजा कासिम भाई हजरत अब्बास को नदी के किनारे काटकर शहीद कर दिया गया था। अंत में दोस्तों के शहीद होने के बाद मौला हुसैन शिविर में गये, इमाम से घर की महिलाओं ने अन्य लोगों के बारे में पूछा तो दुखी होकर उनके शहादत की बात बताई। उसके बाद इमाम घोड़े पर सवार होकर जंग-ए-मैदान की ओर चले तो इमाम की चार वर्षीय पोती सकीना उनसे लिपट गई। जिसको समझाकर बहन जैनब के हवाले कर आगे बढ़े। कर्बला के मैदान में इमाम की वीरता देख यजीद की फौज पीछे भागने लगी।
इमाम के वफादार घोड़े ने कइयो को अपनी टापों से रौंद डाला। यजीदी फौजों ने इमाम को लहुलुहान कर दिया। इमाम नमाज के लिए सर को सजदे में रखा ही था कि जालिम पिसर नामक यजीदी ने गर्दन पे तलवार मारी जिससे सर धड़ से अलग हो गया। इंसानियत तार-तार हो गई, मानवता रो पड़ी, यजीद की फौज ने इमाम के शिविर में आग लगा दी। मौजूद औरतें व बच्चों को कैद कर लिया। कर्बला के तपते रेगिस्तान में शहीद हुए बहत्तर लोगों की लाशों को कई दिनों बाद दफनाया गया। इस तरह इमाम ने इंसानियत को बचाने के लिए सभी को कर्बला के मैदान में कुर्बान करा दिया। परन्तु अत्याचार, असत्य के आगे झुके नहीं। उनकी यादगार में ताजिया रखने के लिए सात मुहर्रम को छोटी व नौंवी की रात में बड़ी ताजिया रखकर मनाया जाता है।

