मुश्ताक अहमद

गोंडा।इमाम-ए-हुसैन का काफिला हक और इंसानियत को जिंदा रखने के लिए कर्बला पहुंचा था।हुर अपने एक हजार लश्कर लेकर साथ चल रहा था,कि कूफा के गवर्नर इब्ने जियाद का खत हुर को एक कासिद ने दिया। खत में गवर्नर ने हुर को हुक्म दिया कि इमाम-ए-हुसैन पर सख्ती करो। उन्हें आगे बढ़ने से रोको और चटियल मैदान में रुकने पर मजबूर करो जहां कोई पनाह की जगह न हो और न ही पानी हो।
हुर ने इब्ने जियाद के हुक्म नामे को पढ़कर इमाम-ए-हुसैन को सुनाया। इमाम-ए-हुसैन ने कहा कि हमें थोड़ा आगे बढ़कर सामने वाले गांवों में ठहरने दो। हुर ने कहा हमारे साथ इब्ने जियाद का निगरान है। जो हमारी गतिविधियों की खबर कूफा के गवर्नर को देता है। हमें हुक्म है कि आप कयाम किसी चटियल मैदान में करें, जहां न साया और न ही पानी। हुर की बात सुनकर इमाम-ए-हुसैन के साथी जुहैर विन कैन ने कहा कि इससे जंग करना हमारे लिए आसान है, बाद में इतनी फौज आ जायेगी कि उनसे लड़ना मुश्किल होगा। इसका जिक्र इस्लामी तारीख में है। इमाम-ए-हुसैन ने कहा कि जंग की शुरुआत हम अपनी ओर से नहीं करेंगे। इमाम-ए-हुसैन ने हुर से कहा कि हमें कुछ और चलने दो। हुर खामोश हो गया। आप बांए तरफ मुड़कर चल पड़े। आपका काफिला थोड़ी ही दूर चला था कि हुर के लश्करों ने रोक दिया और कहा कि बस यहीं ठहर जाइए, दरयाए फुरात यहां से दूर नहीं है। आपने पूछा ये कौन सी जगह है, लोगों ने बताया कि यह कर्बला है। कर्बला का नाम सुनते ही इमाम-ए-हुसैन घोड़े से उतर कर अपने काफिले के लोगों को यहीं कयाम करने को कहा। आपने कहा कि यहीं हमारे कुनबे के लोगों को हक के लिए शहीद होने की जगह है। इस्लामी तारीख के अनुसार मुहर्रम की 02 तारीख, दिन गुरुवार, 61 हिजरी(20 अक्टूबर 680 ई०) का दिन था। कूफा के जालिम गवर्नर इब्ने जियाद के कहने पर आपके पास एक कासिद भेजकर आने की वजह पूछी, आपने उस कासिद उम्रविनसअद से कहा कि कूफा के लोगों ने सैकड़ों खत भेजकर मुझे यहां बुलाया है। यदि तुम लोगों को मेरा यहां आना अच्छा नहीं है तो मैं वापस चला जाऊंगा। उम्रविनसअद ने इमाम-ए-हुसैन से कहा कि इब्ने जियाद की बैअत कर लो। उसके बाद जो मुनासिब होगा करेंगे। मुहर्रम की सात तारीख को उम्रविनसअद को गवर्नर इब्ने जियाद का दूसरा खत मिला, जिसमें लिखा था कि इमाम-ए-हुसैन और उनके खेमे के लोगों का पानी बंद कर दो। इस तरह उन्हें एक-एक बूंद पानी न मिल पाए। खत मिलते ही उम्रविनसअद ने हिजाज जुवैदी को पांच सौ फौज के साथ नहरे-फुरात पर पहरा बैठा दिया और फरमान जारी किया कि इमाम-ए-हुसैन और उनके साथियों को पानी की एक बूंद भी न पहुंचने पाए। तारीख की किताबें इस बात की गवाह हैं कि इमाम-ए-हुसैन की हक के लिए शहादत से तीन दिन पहले से ही पानी बंद कर दिया गया था। नहरे-फरात पर पहरा लग जाने के बाद एक मलून ने इमाम-ए-अली मुकाम को पानी न मिलने का ताना दिया और कहा कि तुम अब प्यासे मर जाओगे (माज अल्लाह) ये जुमला सुनकर आपने दुआ मांगी या अल्लाह इसको प्यासा मार और हर्गिज कभी न बख्श तारीख गवाह है। इसके बाद मौला हुसैन का यह गुस्ताख जालिम बीमार पड़ा और प्यास-प्यास की रट लगाता जैसे ही पानी-पीता पल्टी हो जाती और पानी-पानी चिल्लाता,उसकी प्यास नहीं बुझती,प्यास-प्यास कहते मर गया।
हर ओर बुलंद हो रही या हुसैन की सदाएं
हक और इंसानियत को जिंदा रखने के लिए कर्बला में तीन दिन के भूखे-प्यासे इमाम-ए-हुसैन की शहादत का गम एक से दस मुहर्रम तक विशेष रुप से मनाया जाता है। जबकि शिया समुदाय में इस शहादत को एक माह आठ दिन अजादारी कर इमाम-ए-हुसैन को तहेदिल से याद करते हैं। सियाह लिवास पहनकर मर्द, औरतें व बच्चे मौला हुसैन की याद में कारोबार, रोजमर्रा की दिनचर्या भूलकर इमामबाड़ों में मजलिस, मातम,नौहा व मर्सिया के माध्यम से बारगाहे इमाम में नजरान-ए-अकीदत पेश करते हैं। रिज्वी नगर बौगड़ा में मौलाना हाशिम रजा शाम 6 बजे से मजलिस शुरु और रात्रि दो बजे तक जबकि सहिबापुर में सुबह 6 बजे से दिन भर मजलिसें होती रहती हैं। सभी लोग इमाम-ए-हुसैन पर हुए जुल्म, ज्यादती का जिक्र सूनते ही दहाड़े मारने लगते हैं। आंखों से अश्कों का सैलाब उमड़ पड़ता है।
सामप्रदायिक एकता की खुशबू बिखेर रहा अवध क्षेत्र का मुहर्रम
राहुल तिवारी पाण्डेयपुर निवासी अपने नवजात लाल को मौला हुसैन की नेमत करार देते हैं। इस बार मुहर्रम की नौंवी तारीख को वह महंगी ताजिया रखने के लिए तैयार हैं। इसी तरह चड़ौवा गांव के सियाराम दो दशक से मुहर्रम के जुलूसों में भाग लेते हैं।
ये दो शख्स ईश्वर अल्लाह तेरे नाम की कड़ी की महज बानगी भर हैं। अवध क्षेत्र में ऐसे अनगिनत राहुल तिवारी और सियाराम त्योहारों को सौहार्द के गुलों का तोहफा बताते हुए साम्प्रदायिक एकता और भाईचारगी की पीगें बढ़ाते देखे जा सकते हैं। अवध क्षेत्र यानि अयोध्या के आस-पड़ोस के इलाकों में हिंदू-मुसलमान की यह पद्धति कोई नहीं नहीं है। ये काफी दिनों से रामलीला व रामविवाह, कथा, भागवत व भंडारा में मुस्लिमों के शिरकत करने की ख्वाहिशें देखी जाती हैं तो हिंदुओं द्वारा मुहर्रम में रोजा रखना, मुस्लिमों की मजलिसों में हिस्सा लेना और मौला हुसैन से अपनी जरुरतों की मिन्नतें और फरियाद करने के साथ ही ताजिया रखकर इमाम-ए-हुसैन में अपनी आस्था की अलख जगाते हैं।
यह सिलसिला अब काफी बढ़ चुका है जिसे समाज के बुजुर्ग और बुद्विजीवी काफी सराहनीय कदम बता रहे हैं। 92 वर्षीय फूलमती का तर्क काबिले गौर है। उनका कहना है कि मुल्क में अमन की दुआ मिलकर करें सभी। हर शख्स में तालीम ये हजरत की गौर हो। ताकि सभी को अल्लाह व मौला हुसैन की रहमत मिल सके और अमन चैन से लोग जिंदगी को खूबसूरती से जिएं।
यहां रखी जाती है हिंदुओं की ताजिया
साम्प्रदायिक एकता की मिसाल बना मुहर्रम का त्योहार कई गांवों में चर्चित है जिनमें प्रमुख रुप से जिले के तरबगंज तहसील के अचलपुर,बनघुसरा,नगवा,ढोढिया पारा,खीरीडीह,भषमपुर,धनेश्वरपुर तरबगंज विकास खंड की घांचा बीकापुर,टकटोना,असरथा,रानीपुर,रांगी,पुरैनी,चिलमपुर,डिक्सिर,वनगांव,अमदही आदि गांव शामिल है।
चंदे से भी रखी जाती है ताजिया
यूं तो आपसी स्नेह से त्योहार मनाए जाने वालों का कुनबा बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन किसी भी तरह से अक्षम लोगों में कई लोगों को मिलाकर भी ताजिया रखने का सुरुर यहां कम नहीं। तमाम गांवों में आपस में चंदा लगाकर अच्छी खासी धनराशि एकत्र की जाती है। इस जुटाए हुए पैसे से ताजिया खरीदकर चौक पर बाकायदा रखने के बाद नज्र (फातिहा) और मजलिसे होती हैं। देश में सामाजिक विकास और एकता के लिए यह किसी अच्छे शुभ संदेश से कम नहीं।
अवध के इन जिलों में हो रहा पारस्परिक मुहर्रम
गोंडा,बहराइच,अयोध्या,सुल्तानपुर,बस्ती,अंबेडकरनगर,सिद्वार्थनग,डुमरियागंज,कुशीनगर,पड़रौना,महाराजगंज,बाराबंकी,श्रावस्ती,बलरामपुर जिलों में चल रहा मुहर्रम सभी धर्म जातियों के लिए एकता की मिसाल कहा जा सकता है।

