इमरान अहमद
गोंडा।इस्लाम अनुयायियों के लिए रमजान माह बरकतों और रहमतों का महीना है,इस पूरे महीने में इबादतों का सिलसिला चलता है। यह महीना इस्लाम अनुयायियों के लिए सबसे अहम माना गया है। यह महीना भाईचारे और इंसानियत का न्योता देता है। रोजा दिनभर भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं,बल्कि रोजा आदमी को आदमी से प्यार करना सिखाता है।
मौलाना जाहिद अली नूरी ने कहा कि रोजा रखना तो इबादत है ही,रोजे की हालत में रोजेदारों को ज्यादा से ज्यादा इबादत करनी चाहिए।इफ्तार के समय अपनों व मुल्क की सलामती के लिए दुंआ करें।रोजेदारों को इफ्तार करायें इससे पुण्य मिलता है।
इन चीजों से रोजेदार बचें
रोजे के दौरान झूठ,चुनावी व गाली गलौज आदि तमाम बुरे कामों से दूर रहें,और अपने गुस्से पर काबू रखें।ऐसे में पुण्य बढ़ जाता है।ऊंची आवाज में किसी से बात करने से बचें। रोजे के दौरान शराब,सिगरेट,तंबाकू और नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। रोजे का मतलब हर उस बुराई से दूर रहने की बंदिश है जो इस्लाम में मना है। खुदा का हुक्म है कि रोजेदार अपनी हैसियत के अनुसार इस महीने में गरीब लोगों की ज्यादा से ज्यादा मदद करें। रोजे का मतलब भूख और प्यास का एहसास करें।
इफ्तार कराना पुण्य का काम है:जाहिद
वजीरगंज हबीबनगर मौलाना जाहिद अली नूरी ने विरहमतपुर ‘डिहवा’ की में इफ्तार के दौरान कहा कि इस पवित्र महीने में पहले रोजा से लेकर दसवें रोजे तक पहला अशरा(10 दिनों) का होता है। पहला अशरा रहमतों और अजमतों का अशरा कहा जाता है। उन्होंने कहा कि इस अशरे में अल्लाह रहमतों की बारिश अल्लाह अपने इबादत गुजार बंदों पर करता है। यही वजह है कि रोजेदार अल्लाह के दरबार में रो-रोकर अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं,और अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों की बारिश फरमाते हैं।

