मुश्ताक अहमद
गोंडा।मनमोहक खुशबू और दिल को लुभाने वाले स्वाद के लिए अवध सूबे के नवाब आसिफुद्दौला के निवास से लेकर नेपाल नरेश के महल तक अपनी पैठ जमाने वाला वजीरगंज का खरबूजा अब अतीत की बात बनने की कगार पर पहुंच गया है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो तो वह दिन दूर नहीं जब यह स्वादिष्ट खरबूजा इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जायेगा। अंवारा जानवरों ने न सिर्फ खरबूजे की मिठास छीनी बल्कि तमाम लोगों का रोजगार छीनकर उनके आगे रोजी-रोटी का भी संकट खड़ा कर दिया है। हुक्मरानों की उदासीनता के चलते इन लाजवाब खरबूजों की खेती को नव जीवन नहीं दिया जा सका है।
जिले के तरबगंज तहसील क्षेत्र के माझा, तुरकौली, कनकपुर, इस्माइल पुर, जमादार पुरवा, गिरधारी पुरवा, वजीरगंज आदि दर्जनों गांवों में कभी खरबूजा उत्पादन के लिए पूरे देश में जाना जाता था। इन गांवों के खरबूजों की मिठास बेजोड़ थी। इन खरबूजों से किसान के मेहनत की खुशबू भी आती थी। लेकिन इनकी जमीनों में लगी फसल को अंवारा पशुओं की समस्या के चलते आज यहां की मशहूर खरबूजे का अस्तित्व ही खत्म होने की कगार पर है।
अंवारा पशुओं की समस्या ने अन्य कई कृषि उत्पादनों का भी नुकसान किया है। अब से कोई पांच साल पहले तक यहां के खरबूजे लखनऊ, कानपुर, बरेली, बाराबंकी, लखीमपुर खीरी, बहराइच, शाहजहांपुर, रायबरेली, गोरखपुर व विभिन्न प्रांतों सहित नेपाल राष्ट्र की मंडियों में अपनी शोभा बढ़ाते रहे। इन खरबूजों का बेहतरीन स्वाद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नवाब आसिफुद्दौला के वजीर नवाब आसिफुद्दौला के लिए विशेष रूप से वजीरगंज के खरबूजों की टोकरी लेकर महल तक जाते थे। क्षेत्र के किसान तालुकदार कहते हैं कि खरबूजे की खेती कभी यहां के लोगों का कमाई का जरिया था, और रोजगार भी मिलता था। अंवारा पशुओं की वजह से यह फसल लुत्फ हो रही है। वह मशहूर खुशबू और मीठा खरबूजा अब केवल इतिहास बन कर रह गया है। किसान सालिक राम व रेहान अहमद का कहना है कि अंवारा पशुओं ने फसल छीनी है, और बदले में बेरोजगारी दे दी है। अब यहां के किसानों और मजदूरों को रोजी-रोटी के लिए कस्बे से दूर महानगरों की ओर पलायन करना पड़ रहा है। इसके लिए शासन की नीतियों और जिम्मेदार अधिकारियों को भी दोषी ठहराते हैं।

