मुश्ताक अहमद
गोंडा। पेड़ बेजुबान हैं, दर्द बता नहीं सकते। हम आंख-कान वाले न तो उनकी कराह सुनते हैं और न ही घुटन देखते हैं। वह अपनी आवाज में चीख-चीख कर कहते हैं कि हमें छू के देखो मेरी आंखों से खून बह रहे हैं। पेड़ों का गला घोंटने वाले खुद के बनाए वातावरण में जीते हैं। और आम आदमी घुट-घुटकर जीने को मजबूर होता है।
व्यावसायिक ब्रांड की नुमाइश करने के लिए पेड़ों के सीने पर कील ठोंकीं जाती है। बिजली के पोल को सहारा देने के लिए उनका गला घोंटा जाता है। यह कोई नहीं देखता कि हमारी इन्हीं बेजा हरकतों से बेचारे पेड़ कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के दर्द से तड़पते हैं। और हवा के तेज झोंके से असमय ही ढह जाते हैं।
लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय गोंडा के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रो०फेसर श्रवण कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि पेड़ों में कील ठोंकने से उनका ‘वेस्कुलर सिस्टम’ क्षतिग्रस्त हो जाता है, जिससे जड़ से पत्तियों तक पानी-खाद पहुंचने में बाधा होने लगती है। ऐसे में पेड़ों का मरना तय है। भागीरथी पीजी कालेज वजीरगंज के प्राचार्य गुरुवेन्द्र मिश्रा ने पेड़ों के इस दर्द को समझा। एक वैज्ञानिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि कील ठोंकने से पेड़ को कैंसर होने का खतरा रहता है। प्राचार्य श्नी मिश्रा ने पर्यावरण मंत्री को पत्र भेजा है जिसमें कहा है कि जिले के कई सड़कों के किनारे लगे पेड़ों पर विभिन्न कंपनियों के बोर्ड कीलों से ठोंके गये हैं। ये तरीका गलत है। सीएम और कुछ संस्थाओं को भी ऐसा ही पत्र भेजा है। सेमिनार और अन्य कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें की जातीं हैं, पर व्यवहार में उस पर अमल दूर-दूर तक नजर नहीं आता। न कोई सामाजिक संगठन इसके खिलाफ आवाज उठाता है और न ही वन विभाग।

