मुश्ताक अहमद
गोंडा।पवित्र माह रमजान में आज से लगभग दो दशक पूर्व गांवों की गलियों में तकियादारों की ये आवाजें अब नहीं सुनाई देती हैं कि उठो ऐ रोजेदारों – – – सहरी का वक्त हो गया है।ऐ मोमिनों नींद से नमाज बेहतर है। तकियादार तुम्हारे दरवाजे पर तुमको जगाने आया है। ढप-ढप-ढप,ढपली की आवाज- -। ऐ सोने वालों, तकियादार दे रहा है अल्लाह का पैगाम। उठो सहरी करो। ढप-ढप-ढप ,ढपली की आवाज- -। नमाज फर्ज है ऐ गांव के वासियों। अल्लाह के वंदों उठो- -। तकिया दारों की ऐसी आवाज अलसुबह नहीं गूंजती।
अंधेरी गलियों में तकियादारों की टोलियां घूमती थीं
सिर पर टोपी,गले में हरे रंग का गमछा और मोतियों की माला के साथ तन पर कुर्ता-पाजामा। किसी के हाथ में ढपली तो कोई ढोलक लिए हुए। बस इतना ही लिबास था उन तकियादारों का, जो रमजान की रातों में सोए हुए लोगों को सहरी के लिए जगाने उनके दरवाजे-दरवाजे जाया करते थे। अंधेरी गलियों में तकियादारों की टोलियां घूमती थीं। वजीरगंज के गांवों में तकियादारों का समूह अलग-अलग क्षेत्रों के लिए कस्बे से रवाना होता था।
मोहर्रम अब्बासिया कमेटी के अध्यक्ष बोले
रिज्वीनगर बौगड़ा मोहर्रम अब्बासिया कमेटी के अध्यक्ष मोहसिन रजा विल्सन कहते हैं कि वे 52 साल के हो चुके हैं। रमजान में सहरी के लिए उन्होंने तकियादारों को आवाज लगाते करीब 30 साल तक देखा है। वह परंपरा उससे भी बहुत पहले की रही है। कहते हैं कि तकियादारों के आने की परंपरा खत्म होने के बाद लोग छतों पर लाउडस्पीकर लगवाने लगे। अब वह सब इतिहास हो गया है।
इमाम-ए-आजम अबू हनीफा मदरसा इंतजामिया कमेटी के चेयरमैन ने कहा
धनेश्वरपुर इमाम-ए-आजम अबू हनीफा मदरसा इंतजामिया कमेटी के चेयर मैन मौलाना जाहिद अली बताते हैं कि मोबाइल फोन आने के कुछ समय बाद ही तकियादारों के गांवों में आने की परंपरा लुप्त होने लगी थी। चांद रात में लोग उन तकियादारों के पास पहुंचकर फितरा और जकात देते थे। मौलाना जाहिद अली ने बताया कि यह परंपरा अब इतिहास हो गई है।

