तरावीह नमाज और कुरान पाक की तिलावत से रोशन हुआ ज़र्रा-जर्रा
मुश्ताक अहमद/इमरान अहमद
गोंडा।पवित्र माह रमजान के मौके पर तरावीह और कुरान की तिलावत की गूंज से ज़र्रा-जर्रा रोशन हो रहा है।मस्जिदें रोजेदारों की रौनक से गुलजार हैं,तो घरों में बारगाहे इलाही में पूरा कुनबा सजदा-सजदा है।क्या बूढ़े क्या जवान और क्या बच्चे,औरतें इस पाक महीने में अपने दामन को खुदा के सामने फैलाकर गिड़ गिड़ाकर मगफिरत की दुआएं मांग रही हैं।रमज़ान का जैसे पहला अशरा शुरू हुआ वैसे शहर से लेकर कस्बों और गांवों तक माहे रमजान का चांद सुर्खुरू होता जा रहा है। रमजान के इस सौहार्द संगम के दौरान मुस्लिम अनुयाई अपने तरीके से खुदा की इबादत में लगे हुए हैं।
तौबा व मगफ़िरत का सौगात लेकर आता है रमजान
तौबा और मगफरत के तलबगार लोगों के लिए रमजान निजात की सौगात लेकर आता है।साल भर तक गुनाहों का बोझ ढोने के बाद खुदा ने बंदे को यह पाक महीना गुनाहों से तौबा करने के लिए दिया है।इस महीने में हर मुसलमान बारगाहे इलाही में दुआओं के साथ अपनी हाजत और मगफरत के लिए गिड़गिड़ाता है।यह पाक और सबसे अफजल महीना है।जिसमें हर मुसलमान और मुसलमान बालिग के ऊपर रोजा फर्ज करार दिया गया है।
बंदों के लिए अर्श से आता है इलाही का पैगाम
खुदा अपने बंदों का इम्तिहान लेने के लिए सहरी और अफ्तार के वक्त में काफी तूल दिया है।ऐसा इसलिए कि अल्लाह चाहता है कि उसके बंदे हर आजमाइश में कामयाब होकर दिखाएं।यही वजह है कि इस बार रोजे का वक्त थोड़ा ताबील हो गया है।रहमत और बरकत के इस महीने में बाजारों की रौनक देखने को मिलती है।वक्त-ए-सहरी पर जब मोहल्लों में सहरी से जगाने वाले इबादत गुजार गलियों में रोजेदारों को खबर दार करते हुए निकलते हैं। तब ऐसा लगता है कि अर्श से इलाही का पैगाम बंदों को भेजा जा रहा है।
सहरी इफ़तार के वक्त इबादत गुज़ारो का लगता है जमघट
गोंडा चौक का इलाका हो या फिर मेवातियान मोहल्ला,या मनकापुर का जामा मस्जिद इन इलाकों में सहरी के वक्त इबादत गुज़ारो का जमघट माहे रमजान के लिए खुदा को शुक्रिया लिए लगता है।रोजेदार अफसर हुसैन कहते हैं कि इस बार मौसम और वक्त ठीक है।रोजा रखने में जो इम्तिहान मिलता है वह किसी और काम से नहीं।उनका कहना है कि बगैर नमाज के रोजा अधूरा है। अफसर हुसैन बताते हैं कि बालिग होने के बाद से अब तक उनकी कोशिश रही है कि माहे रमजान का कोई भी रोजा न छूटे।

70 साल के बुजुर्ग इस्लाम अली रख रहें हैं रोजा
70 साल के बुजुर्ग इस्लाम अली का कहना है कि इस उम्र तक रोजा नहीं छोड़ा है। रमजान ऐसा पवित्र महीना है जब इंसान गुनाहों से पूरी तरह पाक कर दिया जाता है।वह बताते हैं कि दशक भर पहले जब संसाधन कम थे तब सहरी के लिए उठाने वाले लोगों की टोलियां सलाम और दुरुद पढ़ते हुए गलियों से निकलते थे।सहरी के लिए जगाते थे।उस वक्त सहरी की दुआ के साथ-साथ एक नात भी बेहद प्रचलित थी।जिसके बोल थे ‘उठो-उठो रोजेदारों-अल्लाह का बुलावा है,सजदा करता है याद,बारगाहे इलाही का पैगाम आया है!’ खवातीन शाहजहां बेगम का कहना है कि इस पवित्र माह रमजान में रोजा और नमाज के साथ-साथ कुरान पाक की तिलावत घर को बरकतों और रहमतों से रोशन करती है।अफ्तार के वक्त जब घर के सारे बुजुर्ग और बच्चे एक साथ रोजा खोलते हैं,तो आसमान से फरिश्ते भी उस घर के लिए दुआएं करते हैं।यकीनन सहरी के वक्त तक रोजेदारों के लिए अफ्तार के वक्त तक रोजेदारों के लिए खुशी का पैगाम आता रहता है।इबादत में लगे रोजेदार अपने कल्ब को इतना मजबूत कर लेता है कि आने वाले वक्त के लिए वह खुद को तैयार कर लेता है।

इंटरनेट की दुनिया में खोए रहने वाले अरशद हुसैन रोजा के साथ पढ़तें हैं नमाज
युवा अरशद हुसैन भी कोई रोजा नहीं छोड़ते हैं,साइबर कैफे चलाते हैं दिन भर इंटरनेट की दुनिया में खोए रहते हैं,उसके बाद भी नमाज और रोजा नहीं छोड़ते।वहीं जिले के कस्बों और गांवों में भी पवित्र और पाक माह रमजान की धूम मची है। हर मस्जिद और हर घर कुरान पाक की तिलावत और तरावीह नमाज से रोशन हो रहा है।बिजली की संकट और तमाम दुश्वारियों के बाद भी बारगाहे इलाही में रोजेदारों का जोश कम नहीं दिख रहा है।
मेरा पहला रोजा….
पवित्र माह रमजान की फजीलतों से बूढ़े,जवान क्या बच्चे सभी वाकिफ हैं।रमजान के रोजे रखने के लिए भोर में सहरी करना और दिनभर इबादतों में गुजारने के बाद शाम को तमाम सब्र का इनाम रोजा इफ्तार में मिलता है।रोजे के फायदे और उसकी लज्जतों की वजह से बच्चे भी बड़े शौक से रोजा रखते हैं।6 साल की सादिया और और सारिबा कौसर ने पहली बार रोजा रखा है।

गोंडा जिले के मनकापुर की रहने वाली सादिया और सारिबा कौसर मनकापुर सेंट थॉमस कालेज में कक्षा दो में पढ़ती है।सादिया बताती है कि रोजा अल्लाह के लिए रखा जाता है।रोजा रखने से दिल को सुकून मिलता है।पहले दिन जब अम्मी-अब्बू सहरी करने उठे तो मैं भी उठ गई।सहरी करके फिर नमाज पढ़ी।रोजाना स्कूल जाती हूं।सादिया और सारिबा कौसर ने 30 रोजे पूरा करने की ठान रखी है।

वहीं 5 साल के मुआविया रुममान व 6 साल की इतफा मरियम भी रोजा रख रहें हैं। वो कहते हैं की दिन में इबादत के साथ पढ़ाई-लिखाई करता हूं।वहीं इतफा मरियम शाम को इफ्तारी तैयार कराने में अम्मी की मदद करती है।

10 साल की रिजा कैश भी रोजा रख रहीं हैं।वह कहती है गर्मी की वजह से भूख-प्यास लगी थी लेकिन हम अपने को पढ़ने में मशरुफ रखें,इस वजह से वक्त कट रहा है।अपने से बड़ों को देखकर वह रोजा नमाज पढ़ती हैं।रिजा ने रोजा रखकर रब से मुल्क में अमन शांति की दुआ की है।

