मुश्ताक अहमद
गोंडा।जनपद कचहरी के भीड़-भाड़ वाले गलियारों में एक लाचार सी काया,चेहरे पर मासूमियत और आंखों में बेबसी लिए खड़ा था। पैरों में चप्पल,हाथों में एफआईआर की कांपी और तहरीर का कागज। यह कोई वकील या मुकदमेबाज़ नहीं, बल्कि एक 17 साल का किशोर दुर्गेश यादव था, जो अपने भाई के कत्ल के मुकदमे में पैरोकार बना हुआ है।
दुर्गेश से मुलाकात तब हुई जब वह कांग्रेस नेता प्रमोद मिश्रा के पैर छूने बढ़ा। लेकिन मिश्रा ने उसे रोककर अपने सीने से लगा लिया। वह सिर झुकाए खड़ा रहा, जैसे मानो कोई सहारा मिलने पर भावनाओं का ज्वार उमड़ आया हो। उसकी इस हालत ने मेरे मन में सवाल जगा दिए—आखिर यह लड़का कौन है, और इतनी कम उम्र में कचहरी का चक्कर क्यों काट रहा है?
दुर्गेश से जब सवाल पूछा,तो जवाब मिला,वो दिल को झकझोर देने वाले था।
परसपुर ब्लॉक के डेहरास तिवारी पुरवा निवासी दुर्गेश यादव अपने बड़े भाई की हत्या का चश्मदीद तो नहीं, लेकिन वह न्याय के लिए सबसे बड़ा पैरोकार बना है। घटना 6 दिसंबर 2022 की है। उस दिन एक निर्दोष भाई को मौत के घाट उतार दिया गया था, और तभी से दुर्गेश की जिंदगी का हर दिन अदालत, पुलिस और सियासत की चौखट पर सिर पटकने में बीत रहा है।
इस सदमे ने उसे महज 15 साल की उम्र में ही पैरालिसिस का शिकार बना दिया था। आज भी उसका आधा शरीर, चेहरे से लेकर पैरों तक, इस हादसे की गवाही दे रहा है। लेकिन शारीरिक तकलीफ से बड़ी वह मानसिक पीड़ा है, जो उसे हर दिन सहनी पड़ रही है।
वह पढ़ना चाहता था, कुछ बनना चाहता था। स्कूल में उसका दाखिला कक्षा 9 में है, लेकिन पढ़ाई का समय उसके पास नहीं है। कचहरी ही अब उसका स्कूल बन चुका है, किताबों की जगह उसके हाथों में केस के कागज हैं, और कलम की जगह दस्तखत के लिए मजबूर उंगलियां।
सरकार हर साल करोड़ों रुपये बच्चों की शिक्षा, उनके स्वास्थ्य और जन कल्याण योजनाओं पर खर्च करती है। लेकिन ये योजनाएं दुर्गेश के लिए बेमानी है।
श्रम और बाल विकास की योजनाएं कहां है, कि जब एक मासूम को अपना हक पाने की पैरवी के बदले जीवन हवन करना पड़ रहा है।
समाज कल्याण और दिव्यांग जन कल्याण विभाग क्यों नहीं देख रहा है, कि आधे शरीर से लाचार यह लड़का अपने जीवन की सबसे कठिन लड़ाई अकेले लड़ रहा है?
शिक्षा विभाग क्यों नहीं पूछता कि उसका एक छात्र स्कूल की बजाय कोर्ट में हाजिरी क्यों लगा रहा है?
स्वास्थ्य योजनाएं क्यों नहीं देख रही हैं, कि पैरालिसिस से पीड़ित यह बच्चा उचित इलाज के अभाव में हर दिन टूटता जा रहा है?
जब स्थानीय नेताओं और प्रशासन से मदद नहीं मिली, तो दुर्गेश न्याय की तलाश में राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ तक जा पहुंचा। गाजियाबाद की यात्रा में वह इस उम्मीद में गया था कि शायद कोई उसकी आवाज सुनेगा। लेकिन हकीकत यह है कि कोई भी राजनीतिक दल उसके लिए आगे नहीं आया।
आज वह ठंड में कांपता,चप्पल पहने,गोंडा कचहरी का चक्कर लगा रहा है। वह अपनी तकलीफ को ताकत में बदलकर इस लड़ाई को आगे बढ़ा रहा है। पर कब तक? आखिर कब तक एक किशोर, जो खुद अभी जीवन की सही समझ भी नहीं रखता, अपने कंधों पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाएगा? और बदले में उसका बचपन उसका जीवन स्वाहा होगा।
दुर्गेश अकेला नहीं है। देशभर में न जाने कितने बच्चे होंगे जिनपर समाज को नज़र डालने की जरूरत है।
सवाल यह नहीं है कि वह न्याय की लड़ाई कैसे लड़ रहा है, बल्कि यह है कि इस लड़ाई को लड़ने में एक बचपन झुलस रहा है।
सरकारी सिस्टम और संवेदनहीन समाज ने एक मासूम से मुह मोड़ लिया है, क्या यह हमारे लिए शर्म की बात नहीं? क्या हम अपने आसपास ऐसे बच्चों को देखकर भी अनदेखा करते रहेंगे? क्या कोई ऐसा नहीं जो इस बच्चे की लड़ाई को मोड़कर उसका बचपन जलने से बचा ले?
दुर्गेश की दास्तान एक आईना है। यहां सरकारी फाइलों में योजनाएं दबी पड़ी हुई हैं। समाज को दुर्गेश जैसे बच्चों के झुलसते बचपन को बचाने की जरूरत है। वरना ऐसे न जाने कितने मासूम बचपन इसी तरह बर्बाद होते रहेंगे।

