मुश्ताक अहमद
गोंडा।पढ़ै फारसी बेचै तेल,देखौ कुदरत का खेल।नजाकत की बोली व तहजीब की भाषा उर्दू अपनी साख नहीं बना पा रही है। इसके लिए अब तक के सरकारी प्रयास सफल नहीं रहे हैं। सरकारी मदरसों में भी योजनाएं परवान नहीं चढ़ पा रही हैं। यह हाल उर्दू का तब है जब इसे वर्ष 1989 में यूपी की दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया है। वह भी इस आशय के साथ कि निर्धारित सात विंदुओं पर सरकारी आदेशों को शामिल किया गया था। बीते तीन दशकों पर निगाह डालें तो पता चलता है कि सरकारी आदेशों के अनुवादों के नामों पर मात्र साधारण गजट का ही अनुवाद किया जाता है। यह कार्य भी काफी पिछड़ा है। अभी वर्ष 20 के अनुवादों को ही निपटाया गया है। वर्ष 2022 में सन 015 तक के आदेशों का उर्दू अनुवाद हो पाया था। अप्रैल 20 में यह कार्य छोड़ कर अप टू डेट अनुवाद करने की योजना बनाई गई है। जिले में इस कार्य के लिए उर्दू अनुवादों की भारी कमी है। आलम यह है कि उर्दू भाषा में सरकारी नेम प्लेट अफसरों के कमरों में भले दिखाई पड़े जांच लेकिन इस भाषा के उत्थान के लिए कोई प्रयास नहीं हो रहा है।
वजूद खो रही है फारसी
उदासीनता की धुंध में विश्व की चर्चित भाषा फारसी धूमिल हो रही है। मदरसों में कामिल फारसी की परीक्षा हर साल हजारों तलबा पास करते है। पर इन्हें प्राप्त सनद सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। इसकी वैधानिक मान्यता स्पष्ट नहीं है। इससे इल्म वाले मदरसों पर ही पूरी तरह से निर्भर रहते हैं। मदरसा प्रवंधन चाहे तो उन्हें अपने संस्थान में शिक्षक की जगह दे सकता है। बाकी विभागों में इसके समकक्ष की अन्य भाषाओं की डिग्री ही मानी जा रही है। प्रदेश मदरसा परिषद मुंशी(फ़ारसी) मौलवी (अरबी) आलिम तथा कामिल (फारसी) की परीक्षाएं आयोजित कराता है। मुंशी, फारसी एवं मौलवी की मान्यता हाईस्कूल तथा आलिम की इंटरमीडिएट के समकक्ष मानी जाती है। लेकिन कामिल या फारसी की समकक्षता के बारे में कोई कुछ नहीं बोलता। तमाम मदरसा वाले इसकी पढ़ाई तो कराते हैं लेकिन सरकारी मान्यता के बारे में कुछ खास नहीं बताते। क्षेत्रीय मदरसा से जुड़े कई लोगों ने शासन से कामिल (फारसी) की मान्यता बीए के समकक्ष करने और रिक्तियों में बराबरी का स्थान दिलाए जाने की मांग की है।
पुलिस विभाग बचा रहा लाज
उर्दू का प्रयोग भले अपेक्षित जगहों पर न होता हो लेकिन पुलिस महकमा इस भाषा की अस्मिता बचाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। यह बात दीगर है कि उर्दू के अल्फाज़ यहां भी पढ़ें और लिखे देवनागरी में ही जाते हैं। थानों में कोई भी पीड़ित व्यक्ति जब सूचना दर्ज कराने पहुंचता है तो तहरीर लेकर गिरफ्तारी के वक्त पुलिस जारी कराती है हुक्म तहरीरी।रोजनामचा,घटनाओं की वारदात तथा सामान रखने की जगह मालखाना,मिले सामानों की बारामदगी,गिरफ्तारी,रपट उर्दू में ही कहे जाते हैं।
ये हैं सात बिंदु
उर्दू में अर्जियां लेना और जवाब देना।
उर्दू भाषा में रजिस्ट्री मंजूर करना।
सरकारी नियमावली व अधिसूचनाओं का उर्दू में प्रकाशन कराना।
सार्वजनिक महत्वों वाले सरकारी आदेशों व इनसे संबंधित प्रपत्रों को उर्दू में जारी कराना।
सरकारी विज्ञापन उर्दू में प्रकाशित कराना।
सरकारी गजट का उर्दू में रुपांतर कराना।
सरकारी नेम प्लेटों पर उर्दू भाषा में लिखाना।

