इमरान अहमद
गोंडा।मौला इमाम हुसैन रसूल के नवासे व मौला अली के बेटे थे। हजरत इमाम हुसैन अपने ‘नाना’ की गोद में पले-बढ़े, बचपन से ही ‘नाना’ के वसूलों को अपनी आंखों से मानवता और इंसानियत फूलते और फैलते हुए देखा था। इस महान कार्य के लिए जो बलिदान उनके ‘नाना’ नबी-ए-करीम ने किया था, उसको वह यजीद के हाथों खत्म होते नहीं देख सकते थे। जब क्रूर शासक यजीद ने इमाम हुसैन से कहा कि तुम मुझे इस्लाम धर्म व सारे मुसलमानों का ‘खलीफा’ स्वीकार कर लो तो मौला हुसैन ने बिना देर किए स्पष्ट रुप से जालिम यजीद को उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया। इमाम जानते थे कि यजीद का चरित्र इस योग्य नहीं है कि उनको ‘खलीफा’ स्वीकार किया जा सके।
इमाम हुसैन 18 रज्जब 60 हिजरी यानि 10 जनवरी 680 ई० 56 वर्ष की उम्र में अपना वतन मदीना छोड़कर सपरिवार कर्बला की ओर चल दिए। मंजिलें तय करते हुए वह हज के इरादे से 60 हिजरी को मक्का पहुंचे।इमाम हुसैन के पहुंचने से पहले ही वहां पर यजीद के सैनिक इमाम हुसैन को कत्ल करने के इरादे से हाजियों के भेष में ‘काबाशरीफ’ में पहुंच चुके थे। इसकी जानकारी इमाम हुसैन को हुई। मौला हुसैन नहीं चाहते थे कि ‘काबा’ की पाक जमीन खून से रंग जाए। जिससे वो अपने सफर को उमरे में परिवर्तित कर कर्बला चले गये। वहां भी जालिम शासक यजीद और उनके साथियों ने इमाम हुसैन को कर्बला के मैदान में चारों ओर से घेराबंदी कर उन पर और उनके परिवार के साथ जुल्म-ज्यादती और बर्बरता करना शुरु कर दिया था।
मुहर्रम की सात तारीख से हक और इंसानियत को मिटाने के लिए यजीद ने इमाम और उनके परिवार व साथियों पर पानी बंद कर दिया। यहां तक कि उनके 6 माह के मासूम बच्चे को शहीद कर दिया। इस प्रकार इमाम ने अपने परिवार और साथियो सहित आखिरी ‘हदीसा’ भी खुदा की राह में पेश कर दिया। तीन दिन भूखा-प्यासा रहकर ‘हक’ के लिए ऐसी जंग की कि हमजा जाफर की शान और हैदरे सफदर की याद दिला दी। इमाम अभी जुल्म से जंग में मशरुफ थे कि आवाज-ए-कुदरत (आकाशवाणी) हुई कि बस करो,हुसैन तुम अपनी सब्र की मंजिल को पूरा कर चुके हो। यह आवाज कान में पड़ते ही इमाम ने अपनी तलवार रोक ली। इसके बाद यजीदी फौज ने इमाम को चारों ओर से घेरकर उन पर एक बारगी हमला कर दिया। इमाम बुरी तरह जख्मी होकर घोड़े से जमीन पर आए और शिम्र नाम के जालिम यजीदी सख्श ने आपको शहीद कर दिया। इमाम हुसैन और उनके परिवार व साथियों की लाशें मैदान-ए-कर्बला की गर्म जमीन पर कई दिनों तक बे कफन रहीं। इमाम हुसैन और उनके बहत्तर जानिंसार साथियो ने कर्बला के मैदान में अपनी कुर्बानी देकर मानवता और इंसानियत को जिंदा-ए-जावेद कर दिया।
17 जुलाई बुधवार को इन्हीं कर्बला के बहत्तर शहीदों के शहीदी का दिन है। इस दिन कर्बला के उन सभी शहीदों को याद किया जाता है,जिन्होंने यजीद की बातिल ताकत को सदा के लिए पूरी दुनियां से खत्म कर दिया।

