अयोध्या।नये कानून पर सोमवार को डॉ० राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या के परिसर में एक संगोष्ठी का आयोजन साकेत महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। मुख्य अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता अखिलेश कुमार शाह ने कहा कि विधि मानव आचरण को विनियमित करती है। सामान्य मानव की प्रवृत्ति अत्यंत चंचल होती है।इसका प्रभाव उसके आचरण पर भी होता है। आचरण का विनियमन आत्मानुशासन के द्वारा भी किया जाता है। और धर्म इसका पथ प्रदर्शन करता है। भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार चार पुरुषार्थ में धर्म का स्थान प्रथम है। धर्म इस रूप में कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध कराता है।इसमें राज्य का हस्तक्षेप नहीं है जिससे यह स्वैच्छिक है। विधि मानव आचरण को विनियमित करने की ऐसी प्रक्रिया है। जिसे राजकीय शक्ति से बल प्राप्त होता है। यह अपनी शक्ति के अनुरूप व्यक्ति के आचरण विनियमन में हस्तक्षेप कर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करती है। आपराधिक विधि अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में बहुधा दण्ड का प्रावधान करती है।इसका विषय क्षेत्र मनुष्य का ऐसा आचरण होता है जिसे सम्बन्धित समाज बिल्कुल सहन नहीं करना चाहता, ऐसे आचरण के प्रति सम्बन्धित जनवर्ग की सहिष्णुता शून्य होती है। इसी भावना के अनुरूप उक्त आचरणों की पुनरावृत्ति रोकने हेतु सम्बन्धित दोषपूर्ण कृत्य से प्राप्त सुख को दुख में परिवर्तित करने हेतु दण्ड का विधान किया जाता है। इस प्रकार दण्ड न्याय का साधन बन जाता है। किंतु दण्ड का निर्धारण करते समय दण्ड के उद्देश्यों एवं अपराध की प्रकृति को भी ध्यान में रखा जाना आवश्यक है अन्यथा सम्बन्धित आपराधिक विधि न्याय प्राप्ति को सुनिश्चित नहीं कर पाएगी।
‘न्याय’ शब्द ऐसे प्रत्याशा का बोधक है,जिसमें प्रत्येक व्यक्ति यह महसूस करता है कि यथाअपेक्षित उसके पक्षों को सुना जाएगा और उस पर गम्भीरता से विचार किया जाएगा। इसी प्रवृत्ति के साथ ‘न्याय’ की सहज स्वीकार्यता है। न्याय का दावा करने पर प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित समझता है। इसीलिए न्याय का दावा सर्वथा अनापत्ति योग्य होता है। नवीन आपराधिक विधि में न्याय को प्रमुखता से देने का दावा किया गया है, ऐसा प्रयास सराहनीय है।
कार्यक्रम में बोलते हुए विधि संकायाध्यक्ष प्रो० अशोक कुमार राय ने कहा कि देश हित सर्वोपरि है। हमारी संसद ने आपराधिक न्याय प्रणाली में तीन नए कानून बनाकर देश हित में ठोस कदम उठाए हैं। ये कानून-भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) 2023 न्याय के अद्वितीय भारतीय लोकाचार पर आधारित हैं दण्ड पर नहीं। ये कानून औपनिवेशिक युग के भारतीय दण्ड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लेंगे। पहले के कानूनों का उद्देश्य मुख्यतः ब्रिटिश शासकों की सुरक्षा करना था। अब, एक नया युग शुरू हो गया है, जो ‘नागरिक पहले, न्याय पहले, गरिमा पहले ‘के सिद्धान्तों पर आधारित है। राजद्रोह के सम्बन्ध में दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है और अपने विचार साझा करने वालों को दण्डित नहीं करता है।
प्रो० राय ने कहा कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध से निपटने की प्रमुखता। नए कानून विभिन्न अपराधों की जांच और मुकदमा चलाने के लिए प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करते हैं और आतंकवाद तथा संगठित अपराध को संबोधित करने के लिए नई दण्ड धाराएँ पेश करते हैं। जीरो-एफआईआर और ई-एफआईआर को शामिल करने से पुलिस की आसान पहुँच सुनिश्चित होती है और एफआईआर दर्ज करने से लेकर आरोप पत्र दाखित करने तक की यात्रा के लिए एक विशिष्ट समय रेखा निर्धारित करना, समयबद्ध तरीके से न्याय प्रदान करने की प्रतिबद्धता इस संहिता के संवेदनशीलता को दर्शाता है। केन्द्र सरकार पुराने आपराधिक कानूनों को खत्म कर दिया है। इसके पीछे मंशा लोगों को सहूलियत प्रदान करना है। जहाँ जरूरत हो वहां सरकार का अभाव नहीं होना चाहिए, लेकिन जहां जरूरत नहीं हो वहां सरकार का प्रभाव भी नहीं होना चाहिए।
कार्यक्रम में बोलते हुए कार्यक्रम के संयोजक ,एसोसिएट प्रोफेसर डॉ० अजय कुमार सिंह ने बताया कि नए आपराधिक कानूनों में तकनीक का इस्तेमाल सुनिश्चित करने हेतु विशेष प्रावधान किया गया है।नए कानून में डिजिटलीकरण को बढ़ावा दिया गया है और ई-एफआईआर पर जोर दिया गया है। पुलिस अधिकारी को 90 दिनों में डिजिटल माध्यमों से पीड़ित को कृत कार्यवाही की जानकारी देनी होगी। फोरेंसिक विज्ञान को बढ़ावा देते हुए अपराध स्थलों का दौरा और सात साल या उससे अधिक की सजा वाले मामलों में वीडियोग्राफी द्वारा साक्ष्य एकत्र करना अनिवार्य कर दिया गया है। पुलिस द्वारा सर्च करने की पूरी प्रक्रिया अथवा किसी संपत्ति का अधिग्रहण करने में इलेक्ट्रानिक डिवाइस के माध्यम से वीडियोग्राफी करना अनिवार्य कर दिया गया है। बलात्कार पीड़िता का बयान ऑडियो/वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दर्ज किया जा सकता है। सभी तलाशी ओर जब्ती प्रक्रियाओं की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग करनी होगी। आरोपी, पीड़ित और गवाहों द्वारा साक्ष्य जमा करने के लिए ऑडियो-वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मोड का उपयोग किया जाएगा। समन और दस्तावेजों की इलेक्ट्रॉनिक आपूर्ति के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ लिया जाएगा। पुलिस द्वारा सर्च और जब्ती की कार्यवाही करने के लिए भी टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाएगा। पुलिस द्वारा सर्च करने की पूरी प्रक्रिया या किसी साक्ष्य का अधिग्रहण करने में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के माध्यम से वीडियोग्राफी की जाएगी। पुलिस अब ऐसी रिकार्डिंग बिना किसी विलंब के संबंधित मजिस्ट्रेट को भेजेगी।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ०शशि कुमार ने कहा कि प्रक्रियात्मक विधि में ट्रायल इन एब्सेंशिया का प्रावधान किया गया है।मुकदमें में तेजी लाने के लिए, अदालत द्वारा घोषित अपराधियों के खिलाफ अनुपस्थिति में मुकदमा शुरू करना, आरोप तय होने से 90 दिनों के भीतर अनिवार्य होगा। घोषित अपराधियों के रूप में घोषित व्यक्तियों के मामलों को संबोधित करने के लिए उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा शुरू करने का प्रावधान किया गया है। साक्ष्य की प्रस्तुति से लेकर अंतिम निर्णय और उचित सजा के निर्धारण तक अनुपस्थिति ढांचे में ही मुकदमा पूरी न्यायिक प्रक्रिया को शामिल करता है। राज्य के खर्च पर घोषित अपराधी को कानूनी प्रतिनिधित्व प्रदान करने के साथ-साथ मुकदमें के दौरान फरार व्यक्ति के उपस्थित होने पर साक्ष्य की जांच करने की अनुमति देकर निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित की गयी है।

