इमरान अहमद
गोंडा।रमजान के पवित्र महीने में आगमन के पूर्व पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब (स०अ०) ने रज्जब और शाबान (हिजरी कैलेंडर में सातवां और आठवां महीना) से ही दुआ करते थे। ‘या अल्लाह तू हमें रजब और शाबान में बरकत अता फरमा और हमें रमजान में पहुंचा दे’।
दरअसल रोजा हमें आत्मसंयम का अभ्यास कराता है,जिससे हम बेहतर इंसान बनते हैं। हमारा तन-मन स्वस्थ होता है। नबी करीम ने फरमाया है, कि ‘रोजा रखो, स्वस्थ रहोगे। यह जमाने की मुसीबतों के लिए ढाल का काम करता है’।
रोजा अल्लाह के आदेशों में से अहम आदेश माना जाता है। खुदा ने मुसलमानों पर रमजान के रोज़े को फर्ज (अनिवार्य) किया है, क्यों कि उसमें हमारे लिए अनगिनत लाभ है। रोजे में जहां आत्मसंयम के कारण हमें शांति और आध्यात्मिक लाभ मिलता है, वहीं आधुनिक युग में विज्ञान भी इसके फायदे को स्वास्थ्यप्रद बताता है।
‘रमजान’ का अरबी भाषा में अर्थ होता है – ‘झुलसा देने वाला और जला देने वाला’। रोजे के दौरान हम आत्मसंयम और अपने अच्छे कार्यों से सभी बुराइयों को जला देते हैं। अल्लाह ने रोजे का एक फायदा यह भी बताया है कि इससे इंसान धीरे धीरे परहेज़गार (संयमी) बनने लगता है। दिलों में लग चुकी जंग दूर हो जाती है, और दिल साफ हो जाता है। इंसान का मन-मस्तिष्क साल भर की गैर-जरुरी इच्छाओं और गुनाहों को स्याही से मैला-कुचैला हो जाता है। रोजा इसी मैल और स्याही को दूर कर मनुष्य के अंतस को उज्जवल बनाने का प्रयास है।
दरअसल रोजे के दरम्यान इंसान जब खाना-पानी छोड़ता है, तो उसकी गैर जरुरी ख्वाहिशें खुद ही खत्म हो जाती है। इस तरह रोजेदार गुनाहों की ओर कदम बढ़ाने से रुक जाता है। खाने पीने और गैर जरूरी इच्छाओं पर काबू पाने से उसकी आत्मा और सांसों में ताजगी पैदा होती है, जिससे इबादत में आनंद आता है। इंसान के मन मस्तिष्क को आध्यात्मिक शांति मिलती है। वह खुद को चुगली, झूठ, चोरी और बुरी नजर डालने आदि से बचने की आदत बना लेता है। इस प्रकार अगर वहीं रोजेदार थोड़ी सी और कोशिश करे तो उसे साल के शेष दिनों में भी इसी आदत को परवान चढ़ाने का अच्छा मौका मिल जाता है। चूंकि ये सब कोशिशें अल्लाह के प्यार और और उसकी खुशी हासिल करने के लिए की जाती है, इसलिए खुदा भी रोजेदार को विशेष रूप से अपनी ओर से पुरस्कार और सवाब (पुण्य) से नवाजता है। वे पहले दस दिनों में रहमत (दया) दूसरे दस दिनों में मगफिरत (माफी) और अंतिम दस दिनों में निजात (मुक्ति) अता करते हैं। रोजा हमारी इच्छाओं पर स्वाभाविक नियंत्रण, भूख-प्यास की शिद्दत का मुकाबला करने, आत्मसंयम, इबादत पर आस्था और मन मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है।

