मुश्ताक अहमद
गोंडा।निराशा का अंधकार जब छा जाए तो कहीं न कहीं से उम्मीद की किरण भी फूटती है। परंपरागत खेती से किसी तरह घिसटती जिंदगी में निराशा का अंधेरा गहराने लगा तो वजीरगंज ब्लाक के करनीपुर मंगराइच निवासी महिला किसान मीरा तिवारी को ब्लॉक के एसडीओ आईएसबी से मिला जैविक सिरका, अचार, चटनी और मुरब्बा तैयार करने का सुझाव उम्मीद की किरण सरीखा लगा। पति को राजी किया और पास के कोल्हू से दो ड्रम गन्ने का रस खरीद लाई।

चार माह में बदली कहानी
चार माह तक बंद करके धूप में रखे इन दो ड्रम को जब उन्होंने खोला तो उनके हाथ समृद्धि का खजाना लग गया। तीन वर्ष पहले की इस पहल से आज उनके परिवार की दशा बदल चुकी है। बेटा गुलाब के नाम पर इस सिरके, अचार, चटनी और मुरब्बे की ब्रांडिंग करके वह इसे इलाहाबाद कुंभ मेले में व आस पास के जिलों में भेज रहीं हैं। आज जैविक सिरके, चटनी, अचार और मुरब्बे का उनका 5 लाख रुपए तक सालाना का कारोबार है। सिरका, अचार चटनी और मुरब्बे को कहीं बेचने जाना नहीं पड़ता, घर से ही बिक जाता है।
राष्ट्रीय आजीविका मिशन से मिली सहायता
हाईस्कूल तक पढ़ी मीरा और इनकी सहेलियों द्वारा सिरका,अचार,चटनी और मुरब्बे को तैयार करने के लिए राष्ट्रीय आजीविका मिशन से जुड़े 1’20 लाख रुपए का ऋण लेकर काम को व्यवसायिक रुप दिया। मिशन ने बाजार भी उपलब्ध करा दिया। वर्तमान में प्रतिवर्ष 5 से 6 हजार लीटर जैविक सिरका तैयार करती हैं। 750 मिली लीटर की बोतल 80 तो पांच लीटर सिरका 450 रुपए में बेचतीं हैं। मीरा ने 15 महिलाओं का समूह भी अपने साथ जोड़ा जो सिरके के साथ-साथ अचार, चटनी और मुरब्बे को तैयार करने से लेकर पैंकिंग तक में हाथ बंटाती हैं। इसके बदले में उन्हें दो से ढाई सौ रुपए प्रतिदिन की आय हो जाती है।

