➡️कदम कदम पर घावों से रिसता है भ्रष्टाचार का मवाद
➡️मेरे अपनों ही ने मुझे लूटा,आश्वासनों से दिल टूटा
मुश्ताक अहमद
गोंडा।’एक दो जख्म नहीं जिस्म है सारा छलनी, दर्द बेचारा परेशां है कहां से उठे’। जी हां यह शेर मेरे हालात पर ही है। मेरा परिचय ! बताती हूं ठहरिए तो सही। मैं एक सड़क हूं, सिसकती सड़क कहें तो ज्यादा बेहतर होगा। अब आप से क्या बताऊं, जब से पैदाइश हुई तबसे आंसू बहा रही हूं। अब तो अपनी दास्तांन बताते कलेजा मुंह को आता है। किसी गैर से नहीं मेरे अपनों ने ही ऐसे-ऐसे जख्म दिए हैं कि लोग मुझसे नफरत करने लगे हैं, गाड़ी वाले बाबू साहब लोग इतनी गालियां देते हैं कि मैं शर्म से पानी पानी हो जाती हूं, लेकिन मुझे बनाने वालों को शर्म नहीं आती। खैर मैं ये सब कहां छेड़ बैठी। मैं तो आप तक सिर्फ अपना दर्द पहुंचाना चाहती हूं।

यूं तो मेरा घर वजीरगंज में झिलाही मोड़ से जमालापुर चौराहे के बीच पड़ता है। जैसे ही वजीरगंज से मेरे घर की तरफ कोई भी मुड़ता है, उसका चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है। दो कदम आगे बढ़ा नहीं कि मुंह से गालियां फूट पड़ती हैं। बहुत हाथ पांव जोड़ती हूं भईयां गाली मत दो, लेकिन कोई नहीं सुनता। पैदल चलने वाले तो हर कदम पर कोसते हैं। अब क्या बताऊं आप से कि मेरे साथ क्या क्या होता है। भूले से अगर कोई लग्जरी गाड़ी वाले साहब आ गये तो वे मुझ पर बरस पड़ते हैं, जैसे सारा कसूर मेरा ही है। एक दिन की बात बताऊं, हुआं ये कि एक रोज दो लोग एक नई नवेली लग्जरी के साथ आए। बस जैसे ही कुछ दूर चले कि भड़ाक से टायर दग गया। बस फिर क्या था, लोग मुझ पर पैर पटकते। इतने पर भी साहब लोगों का जी नहीं भरा तो मेरे ऊपर थूक दिया। इस अपमान से मैं बिलबिला कर रह गई। करती तो क्या करती, मुझे बनाने वालों ने ही कहीं का नहीं छोड़ा तो दूसरे को क्या कहूं।

झिलाही मोड़ से लेकर जमालापुर तक मेरी ये हालत हो गई है कि बड़े बड़े गड्ढे अब नासूर बन गये हैं। गड्ढे मुझमें गुम नहीं हुए, मैं उनमें गुम हो गई। और सुनिए इतना ही नहीं। इन गड्ढों की गिट्टियां जब उछल-उछल कर किसी बेकसूर राहगीर को लगती है तो उसकी आह से मेरा कलेजा छलनी हो जाता है। यकीन मानिए आपको सच बता रही हूं कदम-कदम पर मेरे जिस्म पर इतने घाव हैं कि रात ढले मैं चैन से सोना दूर तो करवट तक नहीं ले पाती। मुझे बनाने वाले कभी मेरे घाव देखने नहीं आए कि इन घांवों में कैसे-कैसे जख्म हैं। बहुत हुआ तो साल में एक या दो बार मिट्टी का मरहम भेज दिया, अब आप भी बताइए मेरे बदन पर इन घावों का इलाज क्या ये मिट्टी के मरहम हैं।

चलिए छोड़िए इसे भी जाने दीजिए, बताइए इन घावों के लिए मैं जिम्मेदार हूं या मेरे वह शाकाहार जिन्होंने मुझे बनाया। सच बताऊं क्या आप यकीन करेंगे। जिस वक्त मेरा यहां जन्म हो रहा था उस वक्त ही मुझे अहसास हो गया था कि मेरी उम्र जानबूझ के छोटी की जा रही है। मुझे बनाने के लिए मेरे अपने ही पीडब्ल्यूडी वालों ने जो चीजें इस्तेमाल की उसी की वजह से आज मैं ठोकरें खा रही हूं। जिस ठेकेदार को मुझे बनाने का ठेका दिया गया था वह तो उस वक्त भी चीख-चीख कर ऐलान कर रहा था कि मोटा पैसा देकर काम लिया है, सड़क जाए ऐसी-तैसी में। बंधवा वाले हों या धनेश्वरपुर वाले किसी से भी पूंछ लीजिए जब से बनी हूं तब से आज तक रोने के सिवा कुछ नहीं कर रही हूं। ऐसा नहीं है कि मेरे सीने से होकर जन के प्रतिनिधि कहलाने वाले नेता जी नहीं गुजरते।
लेकिन उन्हें क्यों मेरे दर्द का अहसास होगा,मैं छोटी सी जो हूं। मेरी तकलीफ़ तो बस इतनी है कि काश एक बार मेरा इलाज ठीक से हो जाता तो मैं लोगों की झिड़कियों और गालियों से बच जाती। मैं ही क्यों जहां कहीं भी मेरी सखी-सहेली है सब बताती है कि उनका हाल मेरे जैसा ही है। बस इस उम्मीद पर जिंदा हूं कि शायद किसी दिन कोई मेरे इलाज के बारे में सोचें भी। फिलहाल लोक निर्माण विभाग के एक्सईएन का कहना है कि सड़क मरम्मत के लिए वर्ष में एक बार ही पैसा आता है। और उनसे मरम्मत करा दी जाती है। अगर फिर भी सड़क टूटती है तो दूसरे सड़क के पैसे से बनाई जाती है।

