मुश्ताक अहमद
गोंडा।होली का खुमार भारतीय संस्कृति में अनेकों खूबसूरत अध्याय जोड़ा है। वो खुमार अवध के नवाबों के सिर चढ़ा तो होली को और रंगीन बना डाला। बृज की होली के बाद रंगों की बहार सर्वाधिक चर्चित और सुंदर बनी अवध में। अवध के नवाब ईरान से आए थे। ईरानी अपना नव वर्ष नौ रोज के नाम से आज भी मनाते हैं। अवध के शासकों को जब भारत में होली देखने को मिली, तो ये उनके लिए सुखद आश्चर्य का विषय बना। फिर तो अवध में होली का ऐसा रंग खेले,जो देश की गंगा-जमुनी तहजीब में मील का पत्थर साबित हुआ।

ऐसे शुरू हुई नवाबों की होली
17 वीं शताब्दी में लखनऊ में अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने होली को नया आयाम दिया। महाराजा टिकैत राय और राजा झाऊ मल अपने नौकरों के हाथ गुलाल भरे चांदी के थाल और गुलाब जल लेकर शाही महल में आते थे, जिसके एवज में नवाब की तरफ से उनकी खातिरदारी का पूरा इंतजाम होता था। नवाब और उनके दरबारी न सिर्फ रंग खेलते, बल्कि संगीत की महफिलों का भी आयोजन होता था। बाद में अवध के छोटे राजा और जमींदार भी अवध के शासकों की तरह होली का जश्न मनाने लगे।
ये थे दिल्चस्प नजारे
तांबे और पीतल के बड़े-बड़े कड़ाहो फूलों से बनाए गये और इत्र मिले रंगों भरे होते थे, जिनमें दरबारियों को रंगों से भिगोया जाता था। सफेद मलमल के कलफ लगे हुए कुर्ते पहनकर होली खेलने का रिवाज नवाबों के दरबारों से होता हुआ लोगों की ड्योढियों तक पहुंच गया। नवाब वाजिद अली शाह के हाथ में बागडोर आने के बाद होली का जैसा रंगीन माहौल अवध में हुआ करता था, उसका मुकाबला जयपुर के रजवाड़े और मुगल दरबार भी नहीं कर पाए। वाजिद अली शाह के हुक्म से ही अवध में होली की बारात निकलने का चलन शुरु हुआ।
नवाबों के महलों से निकलती थी होली बारात
होली बारात में रंगों से भरे बड़े-बड़े बर्तन बैलगाड़ियों और तांगों पर रखकर जुलूस की तरह चलते थे। इसमें हिंदुओं और मुसलमानों की बराबर की भागीदारी होती थी। आगे चलकर बारात में भाड़ों की टोली शामिल होने लगी। जो अपने अभिनय से लोगों को हंसा-हंसा कर बुरा हाल कर देती थी। फागुन का महीना शुरु होते ही बृज के रसधारियों की टुकड़ियां उनके राज्य में डेरा डाल देती थीं। और फिर लोगों के साथ संगीगत का लुत्फ उठाने खुद नवाब वाजिद अली शाह उनके बीच आते थे।

