मुश्ताक अहमद
गोंडा।ढोलक के बिना देसी संगीत अधूरा है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहार तक बिना ढोलक बात नहीं बनती। लेकिन वृक्ष कटाई पर रोक और आम-शीशम की लकड़ी के महंगे होने से ढोलक उद्योग बंद होने की कगार पहुंच गया। हालात तेजी से सुधर रहे हैं। यह मुमकिन हुआ है पोपुलर की लकड़ी के कारण। गोंडा में वाद्य यंत्रों के कारखानों की संख्या दो से बढ़कर आधा दर्जन तक जा पहुंची है।
खुल गई राह
शीशम और आम की लकड़ी पर प्रतिबंध की वजह से पूर्वांचल के सैकड़ों ढोलक कारखाने बंद हो चुके हैं। पहले ढोलक कारोबारियों के लिए सरकार की ओर से लकड़ी का कोटा निर्धारित था, जिसकी वजह से कोई तकलीफ़ नहीं होती थी। बाद में कोटा खत्म कर दिया गया। अमरोहा, बहराइच, नानपारा, औरैया में कई कारखाने बंद हो चुके हैं। हालांकि पापुलर का विकल्प मिलने के बाद कारखाने अब धीरे-धीरे फिर खुलने लग गये हैं। पोपुलर पर कोई प्रतिबंध नहीं है। लिहाजा यह आसानी से उपलब्ध हो जाता है। किसान भी बड़ी मात्रा में पोपुलर के पेड़ तैयार कर रहे हैं। इससे तीन फायदे हुए हैं। कारखानों से जुड़े लोगों को रोजगार तो मिल ही रहा है, किसान भी लाभ कमा रहे हैं और पर्यावरण संरक्षण भी हो रहा है। वहीं जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) से राह और आसान हो गई है।
छह माह में खुले आधा दर्जन कारखाने
पोपुलर से ढोलक व अन्य वाद्य यंत्र बनाए जा रहे हैं। गोंडा व उसके आसपास के क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में यह उपलब्ध है। इसकी कीमत भी शीशम और आम की लकड़ी से आधी है। यही वजह है कि अन्य जिलों के बंद कारखाने अब गोंडा में शिफ्ट हो रहे हैं। छह माह में गोंडा में वाद्य यंत्रों के कारखानों की संख्या दो से बढ़कर करीब आधा दर्जन से अधिक तक जा पहुंची है। जिले में बड़े कारखानों की संख्या करीब तीन है। यहां प्रतिदिन करीब 50 क्विंटल पोपुलर की लकड़ी से ढोलक व अन्य वाद्य यंत्र तैयार होते हैं। एक कुंतल लकड़ी से करीब 1’25 लाख रुपए की कीमत की ढोलक, ढोल, तबला, बैंजो, चमेली, कांगों, डमरू, खंजरी, मारवाज और मुगलिया ड्रम तैयार होते हैं। वहीं छोटे कारखाने में भी करीब 25 से 35 क्विंटल लकड़ी प्रतिदिन खपती है। ढोलक की डिमांड और खपत सबसे अधिक है। गांवों से लेकर शहरों में अब भी इसकी मांग है।
“पोपुलर की लकड़ी की आसानी से उपलब्धता की वजह से ढोलक कारोबार बढ़ गया है। जीएसटी से भी कारोबार को रफ्तार मिली है। वाद्य यंत्रों की विदेश तक डिमांड बढ़ती जा रही है। गोंडा इसका केंद्र बन रहा है। यहां आसपास अनेक किसान पोपुलर का उत्पादन कर रहे हैं। ऐसे में दिक्कतें कम हुई हैं।
सुशील कुमार,मंत्री लकड़ी हस्तकला एसोसिएशन।

