मुश्ताक अहमद
गोंडा।माटी की खुशबू पर ‘रियाल’ की खनक भारी पड़ रही है। पूर्वांचल से प्रतिवर्ष हजारों युवक खाड़ी देशों में रोजगार की तलाश में जाते हैं। रियाल (सऊदी अरब की मुद्रा) का आकर्षण उन्हें अपनी तरफ खींचता है, जबकि यहां फैली मुफलिसी व बेरोजगारी उन्हें खाड़ी देशों की तरफ धकेलती है। खाड़ी देशों में जाकर काम करने वालों की आमदनी पूर्वांचल की अर्थ व्यवस्था पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। इस बीच दक्षिण एशियाई दूसरे देशों से सस्ते श्रमिक उपलब्ध होने के कारण भारतीय श्रमिकों की आय प्रभावित हुई है, क्योंकि तुलनात्मक रुप से यहां के श्रमिक महंगें मानें जातें हैं। इस स्थिति के बाद भी प्रतिदिन अरब देशों की ओर अपना सब कुछ दांव पर लगाकर जाने वालों की संख्या एक निश्चित अनुपात में बनी हुई है।
परदेश जाना आसान नहीं
पुलिस से चरित्र प्रमाण पत्र लेने से लेकर पास्पोर्ट हासिल करने तक कदम-कदम पर शोषण का शिकार होना पड़ता है। इस सबसे उबरने के बाद लोग एजेंटों की हम चक्की में पिस जातें हैं। जाने के पहले उन्हें स्वास्थ्य परीक्षण कर किसी भी तरह प्रमाण पत्र लेना पड़ता है। स्वास्थ्य परीक्षण लखनऊ, दिल्ली या मुंबई आदि स्थानों पर किया जाता है। विदेश जाने वालों की जेब से एक लाख से डेढ़ लाख रुपए तक खर्च हो जाते हैं। पासपोर्ट के लिए दस प्रतिशत के आवेदन पत्र ही गलत भरे होने के कारण छांट दिए जाते हैं। पासपोर्ट मिलने के बाद लोग बीमा एजेंट के दरवाजे पर खड़े हो जाते हैं। ग्रामीण युवक असली व नकली एजेंट के बीच अंतर नहीं कर पाते। नकली एजेंट की चपेट में आने पर यह रकम लेकर चंपत हो जाते हैं। कभी-कभी इन्हें टूरिज्म बीजा थमाकर भेज दिया जाता है।
देखा-देखी पहुंच गए विदेश
इलाके के वजीरगंज,नवाबगंज,मनकापुर,हैदराबाद,शाहपुर,होलापुर,टिकरी के कई लोग अरब देशों में है।बस्ती,अयोध्या,बहराइच,श्रावस्ती,बलरामपुर व बाराबंकी से जुड़े लोग बड़ी संख्या में अरब देशों में हैं।इनमें से बहुत से लोग देखी-देखा वहां तक पहुंच गए हैं।पड़ोस के घर के रिहायशी स्तर में ‘रियाल’ से आई तब्दीली ने उन्हें वहां जाने के लिए प्रेरित किया।

