मुश्ताक अहमद
गोंडा।बकरीद इस्लाम अनुयायियों का सबसे एहमियत और एहितराम वाला पर्व है। यह पाक त्यौहार इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने में मनाया जाता है। जिसमें माह के दसवीं तारीख को ईदगाह व मस्जिदों को बाखुशी सजाकर बारगाहे अल्लाह में सिर को छुकाकर दो रकात नमाज वाजिब पढ़ते है। इस वक्त उनकी यादगार में यह याद दिलाती है कि जिस तरह से धर्म की रक्षा के लिए उन दीवानों , पैगम्बरों ने कुर्बानी दी थी उसी रास्ते को अख्तियार करना चाहिए। धार्मिक नसीहतों, इंसानियत के मार्ग पर अल्लाह के इशारे मात्र से कुर्बान होने का जज्बा हमें यह पाक महीना देता है।
वाकया पैगम्बर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब (स०अ०) के पहले की है। अल्लाह के पैगम्बर हजरत इब्राहीम (अ०स०) को एक ख्वाब आया कि अपनी सबसे प्यारी चीज अल्लाह की राह में कुर्बान कर दो। खुदा के इस फरमान को पैगम्बर ने सर माथे से लगाया और अपने लख्ते जिगर नूरे नजर हजरत इस्माईल (अ०स०) को लेकर मीना घाटी (पहाड़ की ओर) चल दिए। उसी बीच शैतान आदमी के भेष में आकर उन्हें बरगलाने लगा कि आपके ‘अब्बू’ ( पिता ) खुदा की राह में आपकी कुर्बानी देने ले जा रहे हैं तो हजरत इस्माईल(अ० स०) ने कहा कि यह सच है तो इससे अच्छा और क्या है। और तुम कौन हो जो मुझे भड़का रहे हो, तुम शैतान लगते हो। हजरत इस्माईल ने पूरी बात अपने अब्बू से बताया तो कहा कि वह शैतान है। जब हजरत इब्राहीम(अ०स०) हजरत इस्माईल(अ०स०) को लेकर मीना की घाटी में पहुंचे तो अपने लख्ते जिगर से कहा कि ऐ बेटे अल्लाह का हुक्म है कि मैं तुझे उसकी राह में कुर्बान कंरू। हजरत इस्माईल(अ० स०) ने हंसकर कहा कि बेशक अब्बा जान मेरे लिए इससे बड़ी खुश किस्मती और क्या हो सकती है। हजरत इस्माईल की वसीयत के मुताबिक जब पैगम्बर हजरत इब्राहीम (अ०स०) अपनी आंख पर पट्टी बांधकर छुरी चलाई तो वहां करिश्माए खुदा बंदी हुआ कि हजरत इस्माईल की जगह ‘दुम्बा’ हलाल हो गया। हजरत इब्राहीम की अल्लाह के हुक्म पर बेटे को कुर्बान कर देने की यह अदा खुदा को पसंद आई,कुर्बानी वाजिब करार दिया।
कुर्बानी की फजीलत
मदरसा इमाम-ए-आजम अबू हनीफा के चेयरमैन मौलाना जाहिद अली नूरी कहते हैं कि कुर्बानी हर मालदार व्यक्ति पर वाजिब है। कुर्बानी करना बेहद शबाब है। हदीश का हवाला देते हुए बताते हैं कि एक मर्तबा सहाबा-ए-केराम ने हुजूर से पूछा कि कुर्बानी क्या है तो आपने फरमाया कि आपके दादा हजरत इब्राहीम (अ० स०)की सुन्नत है कुर्बानी। फिर सहाबा ने सवाल किया कि इससे शबाब कितना है तो आपने बताया कि जानवर के हर बाल के बदले एक नेकी मिलती है। तभी से बकरे का प्रतीकात्मक कुर्बानी देने का सिलसिला चल पड़ा है।
बकरी पालकों में रौनक बढ़ी
गांवों में बकरों को खरीदने वालों की भीड़ थमने कि नाम नहीं ले रही है। हालांकि महंगाई का असर बकरों की खरीददारी पर भी पड़ता दिख रहा है। जिले के साथ ही गावों में बकरों की खरीद फरोख्त की जा रही है। पिछले साल की अपेक्षा इनकी कीमतों में डेढ़ गुना इजाफा दिखाई दे रहा है। इस्लामी लोक व्यवस्था के अनुसार जिनके पास साढ़े सात तोला सोना व 52 तोला चांदी हो उनपर कुर्बानी करना फर्ज है। बकरीद पर कुर्बानी मुस्लिमों को त्याग के लिए प्रेरित करता है।

