इमरान अहमद
मनकापुर:ईद-उल-अजहा यानी की बकरीद इस्लाम के अनुयाइयों का सबसे अहमियत व एहितराम वाला त्योहार है।यह पाक पर्व इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने में मनाया जाता है,जिसमें माह की दसवीं तारीख को ईदगाह व मस्जिदों को बाखुशी सजाकर अल्लाह की बारगाह में सजदें में सर झुकाकर दो रकात नमाज वाजिब अदा की जाती है।यह वक्त यह याद दिलाता है कि जिस तरह से धर्म की रक्षा के लिए उन दीवानों,पैगम्बरों ने कुर्बांनी दी थी,लोगों को उसी रास्ते पर चलना चाहिए।यह महीना धार्मिक नसीहतों,इंसानियत के मार्ग पर अल्लाह के इशारे मात्र से कुर्बान होने का जज्बा देता है।
तारीख में है की अल्लाह के पैगम्बर हज़रत इब्राहिम अ० सo ने ख्वाब देखा की अल्लाह ने उनसे अपनी सबसे प्यारी चीज़ की कुर्बानी माँगी है।इस लिहाज़ से हज़रत इब्राहिम अ० सo अपने बेटे हज़रत इस्माईल को सबसे ज़्यादा प्यार करते थे,इसलिए उन्होंने अपने बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का फैसला लिया।और वह इस्माईल (अस) को लेकर मीना घाटी की तरफ़ चल दिए।कहा जाता है की इस दौरान इंसान की शक्ल में शैतान ने आकर बेटे को बरगलाने की कोशिश की,लेकिन हज़रत इस्माईल उसकी बातों ने नहीं आए और अपने वालिद के साथ घाटी की तरफ़ चल दिए।वहाँ पहुँचकर हज़रत इब्राहिम अपने बेटे से कहते हैं की ऐ मेरे प्यारे बेटे अल्लाह का हुक्म है कि तुझे उसकी राह में कुर्बान की जाए।इस पर हज़रत इस्माईल (अoसo) ने हँसते हुए कहा बेशक अब्बाजान मेरे लिए इससे बड़़ी खुशकिस्मती और क्या हो सकती है।वसीयत के मुताबिक़ पैगम्बर हज़रत इब्राहिम ने अपने आँखों पर पट्टी बाँध ली,की अपने लखते जिगर को तड़फ़ता ना देख सकें,और उन्होनें बेटे की गर्दन पर छूरी चला दी।उनका यह जज़्बा और हिम्मत अल्लाह को इतनी प्यारी लगी की ठीक उसी वक्त करिश्मा हुआ और छूरी हज़रत इस्माईल की गर्दन पर ना चलकर एक दुंबे पर जा चली।यह अदा खुदा को पसंद आई और कुर्बानी वाजिब कर दी गई।तभी से यह सिलसिला आज तक चला आ रहा है,और मुसलमान हर बकरीद पर एक जानवार की कुर्बानी देता है।
मनकापुर जामा मस्जिद के इमाम मौलाना मुनव्वर अली खान कादरी बतातें हैं की अल्लाह को कुर्बानी बहुत ही प्यारी व अज़ीज़ है।कुर्बानी करना हर मालदार इंसान पर वाजिब (ज़रूरी) है।हदीस में है की एक मर्तबा अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सoतoअo से सहाबा कराम ने पूछा की कुर्बानी क्या है? इस पर आप ने फ़रमाया की कुर्बानी हज़रत इब्राहिम अ०सo की सुन्नत है।फ़िर सहाबा ने पूछा की इसका सवाब कितना है? तो आपने बताया की जानवर के हर एक बाल के बराबर नेकी मिलती है।कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बराबर-बराबर बाँटा जाता है,एक हिस्सा गरीब,मोहताज के लिए,एक हिस्सा दोस्तों,रिश्तेदारों के लिए और बाकी बचा हिस्सा खुद के लिए रखा जाता है।

