मुश्ताक अहमद
गोंडा।सोना-चांदी, हीरा-मोती जवाहरात और मँहगी लग्जरी जिंदगी के दिखावे की जगह अब साधारण बनना और दिखना नया स्टैटस सिम्बल बन रहा है। लोग मंहगे फोन, चमक दमक और भीड़-भाड़ वाली जगह व मोबाइल से दूरी और एकांतवास को नया स्टैटस सिम्बल मानने लगे हैं। मौजूदा समय समाज में एक शानदार परिवर्तन देखने को मिल रहा है। लोग पहले सोशल मीडिया पर सक्रियता, फैशन, और भौतिक संपन्नता को प्रतिष्ठा का प्रतीक(स्टैटस सिम्बल) मानते थे, वहीं अब डिजिटल डिटॉक्स, सादगी, और एकांतवास का नया स्टेटस सिंबल के रूप में अपनाया जा रहा है। यह बदलाव मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत संतुलन की बढ़ती जागरूकता का परिणाम है। लोग समझ रहे हैं कि लगातार डिजिटल जुड़ाव और भौतिक वस्तुओं की होड़ से तनाव बढ़ता है। इसलिए, वे सोशल मीडिया से दूरी बनाकर ध्यान और योग जैसी गतिविधियों में संलग्न हो रहे हैं।
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एक नौकरी पेशा महिला ने बातचीत में उसने कहा कि वो हर सप्ताहांत अपने फोन को बंद करके प्रकृति में समय बिताने का निर्णय लिया है। वह कहती हैं कि इससे उन्हें आंतरिक शांति मिलती है। और मैं अपने परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिता पाती हूं। सादगी और नैतिकता को अपनाने से समाज में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। लोग दिखावे से अधिक आंतरिक संतोष को महत्व दे रहे हैं। एक व्यवसायी, संतोष ने अपने बड़े घर और लग्जरी कारों को छोड़कर एक सादा जीवन अपनाया हुआ है। संतोष अपनी दिनचर्या बहुत कसी हुई और शालीन बना ली है, लोगों से वे बड़ी सहजता से मिलते हैं, उन्हें देखकर उनके धन सम्पति और व्यवसाय का पता लगा पाना बहुत कठिन है, लेकिन उसका मिलना-जुलना उन्हें तमाम लोगों से अलग करने वाला है। समाज में उनकी गिनती बड़े सम्मान से होती है। ये उनका स्टैटस सिम्बल बन गया है। संतोष कहते हैं कि मैं महसूस किया कि भौतिक वस्तुएं असली खुशी नहीं देतीं। अब मैं अपने समय का उपयोग समाज सेवा और आत्म-निरीक्षण में करता हूं। इस परिवर्तन का प्रभाव फैशन और उपभोक्ता बाजार पर भी पड़ा है। मिनिमलिस्टिक फैशन और टिकाऊ उत्पादों की मांग बढ़ रही है, जो सादगी और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को दर्शाति है।
जिले के चौक में एक फैशन डिजाइनर हैं बात-चीत में उन्होंने कहा कि उससे इस बड़े बदलाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। सुमन कहती हैं, कि “ग्राहक अब ऐसे कपड़े पसंद कर रहे हैं जो सरल हों और शरीर के लिए हानिकारक न हों। वे चमक-दमक के पहनावे से दूर होने लगे हैं, साल दो साल पहले शुरू हुआ ये बदलाव अब बढता जा रहा है। जो एक स्वागत योग्य है। लोग मंहगे फाइव स्टार होटलों में जाने के बजाए घर के बने भोजन की ओर बढ़ने लगे हैं। लोग स्थानीय और सांस्कृतिक अनुभवों को प्राथमिकता दे रहे हैं। प्लास्टिक के फूल और ग़मलों से लोगों को ऊबन होने लगी है। अब वे अपने घर के बाहर असली पौधे लगाते हैं। असल फूल की खुशी उन्हें अधिक खुशहाल बना रही है। जिनके घर के बाहर जगह नहीं है वे अपने आँगन, जिनके पास अपने छत नहीं हैं वे अपने बेडरूम तक इन पौधों को लेकर पहुंच गए हैं। मानसिक खुशी शांति से मिलेगी इसका भान लोगों को बखूबी होने लगा है। उन्हें वास्तविक आनंद और संतोष प्रदान करता है।
राजेश सिंह मौजूदा समय में कश्मीर में एक प्रोफेशनल हैं। वो अपने परिवार के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में होमस्टे का अनुभव किया। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि इससे उन्हें स्थानीय संस्कृति को करीब से जानने का मौका मिला और उन्हें सादगी में अपार खुशी का सुख मिला। ये बदलाव इस बात का संकेत हैं कि आंतरिक शांति, सादगी, और नैतिकता अब नए स्टेटस सिंबल बन गए हैं, जो व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर सकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। लोग अब तेज आवाज में बोलने, दादागिरी करने, या भौतिक संपन्नता का दिखावा करने के बजाय, विनम्रता, सादगी, और नैतिक मूल्यों को अपनाकर समाज में एक नई दिशा की ओर अग्रसर हो रहे हैं। सच्ची खुशी और संतोष बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और सादगी में ही है।

